
लखनऊ। दिनभर की भागदौड़, काम का दबाव, मोबाइल और स्क्रीन टाइम के बीच नींद का समय लगातार प्रभावित हो रहा है। कई लोग देर रात तक जागते हैं और सुबह जल्दी उठकर काम पर निकल जाते हैं, जबकि कुछ लोग छुट्टी के दिन घंटों सोकर अपनी नींद पूरी करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में एक सवाल लगातार चर्चा में रहता है कि आखिर एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए रोज कितने घंटे सोना जरूरी है? क्या कम नींद लेने से शरीर जल्दी बूढ़ा होता है और क्या जरूरत से ज्यादा सोना भी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है?
स्वास्थ्य और नींद के बीच संबंध को समझने के लिए वैज्ञानिक लंबे समय से अध्ययन करते रहे हैं। नेचर जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने नींद की अवधि और शरीर की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के बीच संबंध का विश्लेषण किया। इस अध्ययन में यूके बायोबैंक के करीब पांच लाख लोगों से जुड़े स्वास्थ्य आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि अलग-अलग अवधि तक सोने वाले लोगों में शरीर की जैविक उम्र और स्वास्थ्य से जुड़े संकेत किस तरह अलग दिखाई देते हैं।
6 से 8 घंटे की नींद क्यों चर्चा में है?
आमतौर पर वयस्कों के लिए करीब 7 से 9 घंटे की नींद की सलाह दी जाती है, हालांकि व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, जीवनशैली और अन्य परिस्थितियों के आधार पर नींद की जरूरत अलग-अलग हो सकती है। अध्ययन में भी नींद की अवधि और स्वास्थ्य संकेतों के बीच एक सीधा संबंध दिखाई देने के बजाय एक U-आकार का पैटर्न सामने आया।
इसका आसान मतलब यह है कि बहुत कम नींद और बहुत ज्यादा नींद, दोनों ही स्थितियों में उम्र बढ़ने से जुड़े कुछ संकेत अधिक दिखाई दिए। वहीं, सामान्य अवधि की नींद लेने वाले लोगों में ऐसे संकेत अपेक्षाकृत कम पाए गए।
यहां यह समझना जरूरी है कि इस तरह के अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि कम या ज्यादा सोना सीधे तौर पर किसी व्यक्ति को जल्दी बूढ़ा कर देता है। शोध में मुख्य रूप से अलग-अलग नींद की अवधि और स्वास्थ्य से जुड़े संकेतों के बीच संबंध देखा गया है।
बहुत कम नींद से शरीर पर क्या असर पड़ सकता है?
नींद सिर्फ आराम करने का समय नहीं है। जब व्यक्ति सोता है, उस दौरान शरीर कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को पूरा करता है। शरीर की मरम्मत, ऊर्जा का संतुलन, प्रतिरक्षा प्रणाली का कामकाज और दिमाग से जुड़ी कई प्रक्रियाएं नींद से जुड़ी होती हैं।
अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक पर्याप्त नींद नहीं लेता, तो इसका असर उसकी दिनचर्या और स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। लगातार कम नींद लेने से थकान, ध्यान लगाने में परेशानी, चिड़चिड़ापन और कार्यक्षमता में कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
लंबे समय में अपर्याप्त नींद का संबंध मोटापा, मधुमेह, हृदय संबंधी समस्याओं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ परेशानियों के बढ़े हुए जोखिम से भी पाया गया है। हालांकि, किसी व्यक्ति की बीमारी का कारण केवल उसकी नींद को मान लेना सही नहीं होगा। स्वास्थ्य पर उम्र, खान-पान, व्यायाम, तनाव, आनुवंशिक कारण और कई अन्य कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।
क्या ज्यादा सोना भी समस्या हो सकता है?
जब नींद की बात होती है तो अक्सर कम सोने के नुकसान पर चर्चा होती है, लेकिन जरूरत से ज्यादा सोने का सवाल भी महत्वपूर्ण है। अध्ययन में लंबे समय तक ज्यादा सोने वाले लोगों में भी कुछ ऐसे स्वास्थ्य संकेत देखे गए जो शरीर की उम्र बढ़ने से जुड़े थे।
हालांकि, यहां भी कारण और परिणाम को लेकर सावधानी जरूरी है। जरूरी नहीं कि ज्यादा सोने से ही स्वास्थ्य खराब हुआ हो। कई बार किसी बीमारी, शारीरिक कमजोरी, तनाव या अन्य स्वास्थ्य समस्या के कारण व्यक्ति ज्यादा समय तक बिस्तर पर रह सकता है।
यानी यह भी संभव है कि खराब स्वास्थ्य के कारण नींद की अवधि बढ़ी हो। यही वजह है कि वैज्ञानिक नींद और स्वास्थ्य के संबंध को एकतरफा कारण-परिणाम के रूप में देखने के बजाय दोनों के बीच दोतरफा संबंध की संभावना पर जोर देते हैं।
नींद और जैविक उम्र में क्या संबंध है?
हमारी उम्र केवल कैलेंडर में बीत रहे वर्षों से तय नहीं होती। वैज्ञानिक शोध में शरीर की जैविक उम्र को भी समझने की कोशिश की जाती है। जैविक उम्र का संबंध इस बात से है कि शरीर की कोशिकाएं, अंग और विभिन्न जैविक प्रक्रियाएं किस स्थिति में हैं।
किसी व्यक्ति की कालानुक्रमिक उम्र समान हो सकती है, लेकिन दो लोगों की जैविक स्थिति अलग-अलग हो सकती है। जीवनशैली, खान-पान, शारीरिक गतिविधि, तनाव, नींद और अन्य स्वास्थ्य कारक इस प्रक्रिया से जुड़े हो सकते हैं।
इसी संदर्भ में अध्ययन में नींद की अवधि और शरीर में उम्र बढ़ने से जुड़े संकेतों के बीच संबंध देखा गया। शोधकर्ताओं को बहुत कम और बहुत ज्यादा सोने वाले लोगों में ऐसे संकेत अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दिए।
दिल और दिमाग के लिए नींद की जरूरत क्या एक जैसी है?
अध्ययन की एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि शरीर के अलग-अलग हिस्सों के लिए नींद की जरूरत बिल्कुल समान नहीं हो सकती। शोध में हृदय और मस्तिष्क से जुड़े संकेतों के संदर्भ में नींद की अलग-अलग अवधि के संबंध सामने आए।
मसलन, अध्ययन के विश्लेषण में हृदय स्वास्थ्य से जुड़े कुछ संकेतों के लिए करीब छह घंटे की नींद का संबंध दिखाई दिया, जबकि मस्तिष्क से जुड़े संकेतों में करीब आठ घंटे की नींद अधिक अनुकूल दिखाई दी।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को दिल के लिए छह घंटे और दिमाग के लिए आठ घंटे की नींद लेनी चाहिए। इन आंकड़ों को व्यक्तिगत नींद का नियम नहीं माना जाना चाहिए। शरीर की नींद की जरूरत व्यक्ति-दर-व्यक्ति बदलती है और केवल किसी एक अध्ययन के आधार पर अपनी नींद की अवधि तय करना उचित नहीं होगा।
क्या 6 घंटे की नींद पर्याप्त है?
यह सवाल बहुत से लोगों के मन में आता है। अगर किसी अध्ययन में छह घंटे की नींद का संबंध कुछ स्वास्थ्य संकेतों से दिखाई देता है तो क्या हर व्यक्ति छह घंटे सो सकता है?
इसका जवाब सीधा ‘हां’ नहीं है। नींद की जरूरत उम्र और व्यक्ति की परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकती है। किसी व्यक्ति के लिए छह घंटे पर्याप्त महसूस हो सकते हैं, जबकि किसी दूसरे व्यक्ति को इससे काफी ज्यादा नींद की जरूरत हो सकती है।
सिर्फ घंटे गिनना ही पर्याप्त नहीं है। नींद की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर कोई व्यक्ति आठ घंटे बिस्तर पर रहता है लेकिन बार-बार उसकी नींद टूटती है, खर्राटों या सांस रुकने जैसी समस्या होती है या वह सुबह उठने के बाद भी लगातार थका महसूस करता है, तो केवल आठ घंटे सोना स्वस्थ नींद की गारंटी नहीं है।
नींद की गुणवत्ता क्यों महत्वपूर्ण है?
स्वस्थ नींद के लिए पर्याप्त अवधि के साथ-साथ नींद का लगातार और आरामदायक होना भी जरूरी है। रात में बार-बार जागना, देर तक मोबाइल देखना, अनियमित समय पर सोना और लगातार तनाव में रहना नींद की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।
विशेषज्ञ आमतौर पर नियमित सोने और जागने का समय बनाए रखने, सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करने, शाम के बाद कैफीन का सेवन सीमित करने और आरामदायक नींद का वातावरण बनाने की सलाह देते हैं।
दिन में शारीरिक गतिविधि और नियमित व्यायाम भी नींद की गुणवत्ता में मदद कर सकते हैं। हालांकि, सोने से ठीक पहले बहुत अधिक भारी व्यायाम कुछ लोगों में नींद को प्रभावित कर सकता है।
क्या नींद उम्र बढ़ने की वजह है या उम्र बढ़ने से नींद बदलती है?
यही इस विषय का सबसे दिलचस्प सवाल है। अगर कम नींद लेने वालों में उम्र बढ़ने के संकेत अधिक पाए जाते हैं, तो क्या कम नींद उम्र बढ़ने की वजह है? या फिर शरीर में होने वाले बदलावों के कारण नींद कम या ज्यादा होने लगती है?
शोधकर्ताओं के मुताबिक दोनों दिशाओं में प्रभाव संभव है। यानी नींद की कमी या खराब नींद शरीर के स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है, और दूसरी तरफ स्वास्थ्य में बदलाव व्यक्ति की नींद की अवधि और गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ नींद का पैटर्न भी बदल सकता है। कुछ लोगों को रात में जल्दी नींद आने लगती है, कुछ लोगों की नींद बार-बार टूटती है और कुछ लोग सुबह जल्दी उठ जाते हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और दवाएं भी नींद को प्रभावित कर सकती हैं।
अध्ययन की सीमाएं भी समझना जरूरी
करीब पांच लाख लोगों के स्वास्थ्य आंकड़ों का अध्ययन निश्चित रूप से बड़ा डेटा सेट है, लेकिन किसी भी शोध के निष्कर्ष को समझते समय उसकी सीमाओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
ऐसे अध्ययन में किसी संबंध का पाया जाना यह साबित नहीं करता कि एक चीज दूसरी चीज का प्रत्यक्ष कारण है। नींद की अवधि के अलावा खान-पान, शारीरिक गतिविधि, तनाव, सामाजिक परिस्थितियां, बीमारियां और अन्य जीवनशैली संबंधी कारक भी स्वास्थ्य और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि केवल छह, सात या आठ घंटे सोने से कोई व्यक्ति निश्चित रूप से स्वस्थ रहेगा या उसकी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हो जाएगी।
कितनी नींद लें?
एक स्वस्थ वयस्क के लिए सामान्य तौर पर करीब 7 से 9 घंटे की नींद को उपयुक्त माना जाता है, लेकिन व्यक्तिगत जरूरत अलग हो सकती है। बच्चों और किशोरों को इससे अधिक नींद की जरूरत होती है।

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