
समान नागरिक संहिता यानी UCC अब सिर्फ कानून का मुद्दा नहीं रह गया है। यह 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के बड़े राजनीतिक एजेंडे के रूप में सामने आ चुका है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर को मुंबई में ऐलान किया कि 2029 से पहले भाजपा के नेतृत्व वाले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू कर दिया जाएगा। उत्तराखंड में यह लागू हो चुका है, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। कई अन्य राज्यों में ड्राफ्ट तैयार करने की प्रक्रिया शुरू है।
लेकिन सवाल यह है कि जब संविधान पूरे देश में समान नागरिक संहिता की बात करता है तो इसे एक साथ पूरे भारत में लागू क्यों नहीं किया जा रहा?
संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य से अपेक्षा की गई है कि वह पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता हासिल करने का प्रयास करेगा। लेकिन यह नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है। यानी सरकार के लिए यह संवैधानिक लक्ष्य है, बाध्यकारी आदेश नहीं। इसके अलावा व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषय समवर्ती सूची में हैं। इसलिए संसद के साथ राज्य विधानसभाओं को भी इन पर कानून बनाने का अधिकार है।
यही वजह है कि UCC का मौजूदा मॉडल राष्ट्रीय कानून के बजाय राज्य आधारित बन गया है।
उत्तराखंड ने फरवरी 2024 में UCC कानून पारित किया और जनवरी 2025 में इसे लागू कर दिया। इसके बाद गुजरात ने मार्च 2026, असम ने मई और मध्य प्रदेश ने जुलाई 2026 में इस दिशा में कदम बढ़ाए। हालांकि इन राज्यों में कानून की अंतिम संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया अभी महत्वपूर्ण है। महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ड्राफ्टिंग कमेटियां बनाई जा चुकी हैं।
इस मॉडल की सबसे बड़ी कमजोरी भी यहीं दिखाई देती है। अगर हर राज्य अपनी नागरिक संहिता बनाएगा तो क्या वह वास्तव में ‘समान’ नागरिक संहिता होगी? अलग-अलग राज्यों में विवाह, उत्तराधिकार, गोद लेने या पंजीकरण से जुड़े नियमों में अंतर हुआ तो नागरिकों के अधिकार राज्य की सीमा बदलते ही बदल सकते हैं। ऐसे में UCC का मूल विचार-समान नागरिक नियम- कमजोर पड़ सकता है।
केंद्र सरकार के लिए सीधे राष्ट्रीय UCC लाना राजनीतिक रूप से भी आसान नहीं है। NDA में ऐसे सहयोगी दल हैं जो UCC का विरोध कर रहे हैं। बिहार जैसे राज्यों में सहयोगी दलों की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में केंद्र में सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण है। भाजपा के लिए राज्य सरकारों के जरिए UCC लागू करना फिलहाल अधिक व्यावहारिक रास्ता दिखाई देता है।
इस पूरी कवायद में जनजातीय समुदायों का सवाल सबसे संवेदनशील है। पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत कई जनजातीय इलाकों को उनके पारंपरिक कानूनों और सामाजिक व्यवस्थाओं के लिए विशेष संरक्षण मिला हुआ है। विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक व्यवस्था से जुड़े रीति-रिवाज उनकी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े हैं। इसलिए UCC से उन्हें बाहर रखने का तर्क सांस्कृतिक अधिकारों के संरक्षण पर आधारित है।
असम में भी जनजातीय समुदायों को UCC से छूट दी गई है। लेकिन इससे एक दूसरा सवाल पैदा होता है—यदि समान कानून समानता की गारंटी है तो कुछ समुदायों को इससे बाहर रखने का आधार क्या होगा? आलोचक इसे राजनीतिक सुविधा से जोड़ते हैं, जबकि सरकार इसे सांस्कृतिक और संवैधानिक संरक्षण का मामला बताती है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर विवाद इससे भी ज्यादा तीखा है। UCC के समर्थकों का कहना है कि व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद लैंगिक असमानताओं को खत्म करने के लिए समान कानून जरूरी है। खासकर विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में महिलाओं को समान अधिकार देना इसका प्रमुख उद्देश्य बताया जाता है।
विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि धार्मिक स्वतंत्रता भी संविधान का मूल अधिकार है। उनका सवाल है कि सुधार के नाम पर धार्मिक परंपराओं में कितना हस्तक्षेप किया जा सकता है। यही बहस अनुच्छेद 44 और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अनुच्छेद 25 से 28 के बीच संतुलन का संवैधानिक सवाल पैदा करती है।
इसलिए UCC की लड़ाई केवल कानून बनाने की लड़ाई नहीं है। यह तय करने की लड़ाई भी है कि समानता की परिभाषा क्या होगी और उसे लागू करने की सीमा कहां तक होगी।
2029 तक 21 NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य निश्चित रूप से बड़ा राजनीतिक संदेश है। लेकिन इसके रास्ते में कानून, संघवाद, गठबंधन राजनीति, जनजातीय अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता जैसी कई दीवारें हैं।
आखिरकार UCC की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने राज्यों ने कानून बना लिया। असली कसौटी यह होगी कि क्या इन कानूनों से नागरिकों को वास्तव में समान अधिकार मिलते हैं, महिलाओं की स्थिति मजबूत होती है, सांस्कृतिक अधिकार सुरक्षित रहते हैं और अलग-अलग समुदायों के बीच भरोसा कायम रहता है।
वरना ‘एक देश, एक नागरिक संहिता’ का नारा कई राज्यों में लागू अलग-अलग संहिताओं की ऐसी तस्वीर में बदल सकता है, जहां एकरूपता का दावा तो हो, लेकिन कानूनों में एकरूपता खुद सवाल बन जाए।






