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BRICS बनाम NATO: क्या बदलती दुनिया में शक्ति का नया संतुलन बन रहा है?

क्या BRICS देशों से लड़ सकता है NATO, कौन ज्यादा ताकतवर?
क्या BRICS देशों से लड़ सकता है NATO, कौन ज्यादा ताकतवर?
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Written by
Rishabh Rai

नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान इस सवाल की ओर खींचा है कि क्या BRICS भविष्य में NATO के मुकाबले किसी वैकल्पिक वैश्विक शक्ति-केंद्र के रूप में उभर सकता है? यह सवाल जितना आकर्षक है, उतना ही जटिल भी। दरअसल BRICS और NATO की तुलना सीधे-सीधे करना उचित नहीं है, क्योंकि दोनों की स्थापना, उद्देश्य और संस्थागत संरचना अलग-अलग है। NATO मूल रूप से सामूहिक सुरक्षा और सैन्य रक्षा का गठबंधन है, जबकि BRICS आर्थिक, राजनीतिक और विकास संबंधी सहयोग का मंच है। इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि BRICS NATO को हरा सकता है या नहीं, बल्कि यह कि बदलती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में BRICS किस प्रकार वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर रहा है।

NATO और BRICS में बुनियादी अंतर

NATO की सबसे बड़ी ताकत उसकी सैन्य एकजुटता है। उसके सदस्य सामूहिक रक्षा के सिद्धांत से जुड़े हैं और गठबंधन के पास सैन्य योजना, कमान, खुफिया सहयोग तथा विभिन्न देशों की सेनाओं के बीच interoperability की विकसित व्यवस्था है। NATO की सामूहिक रक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार Article 5 है, जिसके तहत एक सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन के खिलाफ हमला माना जाता है।

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BRICS की स्थिति इससे बिल्कुल अलग है। BRICS के सदस्य देशों के बीच ऐसी कोई सामूहिक रक्षा संधि नहीं है। भारत, चीन, रूस, ईरान, UAE, ब्राजील सहित सदस्य देश अपनी स्वतंत्र विदेश और रक्षा नीतियां चलाते हैं। इसलिए BRICS के देशों की संयुक्त सैन्य क्षमता को किसी एकीकृत सैन्य शक्ति के रूप में देखना सही नहीं होगा।

यही कारण है कि यदि सवाल केवल सैन्य गठबंधन की क्षमता का हो तो NATO स्पष्ट रूप से आगे है। लेकिन वैश्विक शक्ति को केवल हथियारों और सैनिकों की संख्या से मापना भी अधूरा दृष्टिकोण होगा।

BRICS की वास्तविक ताकत कहां है?

BRICS की ताकत उसकी आर्थिक, जनसांख्यिकीय और संसाधन क्षमता में है। भारत की अध्यक्षता में 2026 का BRICS सम्मेलन 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में हुआ। संगठन में पिछले कुछ वर्षों में विस्तार हुआ है और इसके सदस्य देशों में दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं तथा महत्वपूर्ण ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन वाले देश शामिल हैं।

चीन की विनिर्माण क्षमता, भारत का विशाल बाजार और तकनीकी क्षमता, रूस के ऊर्जा एवं खनिज संसाधन, ब्राजील की कृषि क्षमता तथा पश्चिम एशिया के देशों की ऊर्जा और वित्तीय ताकत BRICS को अलग-अलग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सामर्थ्य देती है।

इसका अर्थ यह है कि BRICS की शक्ति किसी एक संयुक्त सेना में नहीं, बल्कि कई प्रकार की क्षमताओं के सम्मिलित प्रभाव में है।

आर्थिक मोर्चे पर मुकाबला ज्यादा महत्वपूर्ण

आज की वैश्विक राजनीति में आर्थिक शक्ति सैन्य शक्ति जितनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी है। अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं तथा डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के कारण NATO देशों का आर्थिक और वित्तीय प्रभाव बहुत बड़ा है। इसके मुकाबले BRICS के पास दुनिया की बड़ी आबादी, विशाल उपभोक्ता बाजार, ऊर्जा संसाधन और महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा है।

इसीलिए BRICS के भीतर आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, भुगतान प्रणालियों में विविधता और वैश्विक व्यापार व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दे लगातार महत्व हासिल कर रहे हैं।

2026 के नई दिल्ली घोषणा-पत्र में भी व्यापार, आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखलाओं और बहुपक्षीय व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर जोर दिया गया है। BRICS देशों ने एकतरफा व्यापारिक उपायों और संरक्षणवाद को लेकर चिंता भी व्यक्त की है।

यह पश्चिमी व्यवस्था को रातोंरात बदल देने की कोशिश नहीं है, लेकिन यह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अधिक विकल्प और अधिक bargaining power की मांग जरूर है।

BRICS की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी

BRICS की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। एक ही मंच पर भारत और चीन जैसे रणनीतिक प्रतिस्पर्धी देश मौजूद हैं। रूस और पश्चिम के बीच गंभीर टकराव है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव है। पश्चिम एशिया के देशों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित हैं।इसके बावजूद BRICS ने 2026 के शिखर सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणा को स्वीकार किया। मध्य-पूर्व के संघर्ष जैसे जटिल मुद्दे पर अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच सहमति बनाना इस संगठन की कूटनीतिक क्षमता को दर्शाता है। लेकिन यह भी स्पष्ट करता है कि BRICS NATO की तरह एकीकृत राजनीतिक या सैन्य संगठन नहीं बन सकता। उसके सदस्य किसी भी मुद्दे पर समान दृष्टिकोण रखने के लिए बाध्य नहीं हैं।

क्या BRICS पश्चिम-विरोधी गठबंधन बन रहा है?

इस सवाल का जवाब भी सावधानी से देना होगा। BRICS में ऐसे देश जरूर हैं जो मौजूदा पश्चिम-केंद्रित वैश्विक व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं, लेकिन सभी सदस्य देशों को “पश्चिम-विरोधी” समूह के रूप में देखना गलत होगा।

भारत का दृष्टिकोण इसका अच्छा उदाहरण है। भारत BRICS में सक्रिय है, लेकिन साथ ही अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ भी रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध बढ़ा रहा है। भारत की विदेश नीति का प्रमुख तत्व किसी एक शक्ति-गुट में बंधने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार विभिन्न मंचों पर सहयोग करना है।

इसे रणनीतिक स्वायत्तता या multi-alignment की नीति के रूप में समझा जा सकता है।

2026 का BRICS सम्मेलन भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत के लिए इस सम्मेलन का महत्व केवल BRICS के विस्तार तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली ने Global South की आवाज को मजबूत करने, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की निर्णय-प्रक्रिया में अधिक भूमिका पर जोर दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने Global South को केवल वैश्विक नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियमों के निर्माण में भूमिका निभाने वाला पक्ष बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

यही भारत की कूटनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू है। भारत BRICS को किसी सैन्य ब्लॉक में बदलने के बजाय उसे आर्थिक सहयोग, विकास, वैश्विक शासन सुधार और कूटनीतिक संवाद के मंच के रूप में मजबूत करना चाहता है।

तो क्या BRICS NATO का मुकाबला कर सकता है?

यदि “मुकाबला” का अर्थ सैन्य गठबंधन से है तो फिलहाल इसका जवाब नहीं है। NATO के पास संयुक्त सैन्य कमान, collective defence और अत्यधिक विकसित सैन्य interoperability है। BRICS के पास ऐसी व्यवस्था नहीं है। लेकिन यदि मुकाबले का अर्थ वैश्विक प्रभाव से है, तो तस्वीर बदल जाती है। BRICS आर्थिक शक्ति, ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन, विशाल बाजार और Global South की राजनीतिक आवाज के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपना प्रभाव बढ़ा सकता है।इसलिए BRICS को NATO का सैन्य विकल्प कहना गलत होगा। उसे अधिक सही रूप में एक ऐसे आर्थिक और कूटनीतिक counterweight के रूप में देखा जा सकता है, जो दुनिया को एकध्रुवीय व्यवस्था से अधिक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर ले जाने में योगदान दे सकता है। BRICS और NATO की तुलना करते समय सबसे जरूरी बात यह समझना है कि शक्ति केवल सैन्य हथियारों से निर्धारित नहीं होती। NATO की शक्ति उसकी सैन्य एकजुटता और सामूहिक रक्षा व्यवस्था में है, जबकि BRICS की ताकत उसकी जनसंख्या, बाजार, संसाधनों, ऊर्जा और Global South में बढ़ते प्रभाव में है। भविष्य की विश्व व्यवस्था शायद “NATO बनाम BRICS” जैसी सीधी प्रतिस्पर्धा नहीं होगी। इसके बजाय दुनिया में अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग देशों और समूहों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चलेगी। भारत के लिए इस बदलती व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण रणनीति यही है कि वह किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखे और जहां राष्ट्रीय हित हों, वहां विभिन्न शक्तियों के साथ सहयोग करे।

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