
दिल्ली सिर्फ देश की राजधानी नहीं है। यह उन लाखों परिवारों के सपनों की भी राजधानी है, जो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए यहां भेजते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाला देश के किसी छोटे शहर, कस्बे या गांव का छात्र अपने साथ सिर्फ किताबें और कपड़े नहीं लाता, वह अपने परिवार की उम्मीदें लेकर आता है। मां-बाप उसे यह सोचकर दिल्ली भेजते हैं कि बच्चा पढ़ेगा, आगे बढ़ेगा और एक दिन अपने पैरों पर खड़ा होगा। लेकिन जब वही बच्चा किसी जर्जर इमारत के मलबे में दब जाता है तो सवाल सिर्फ एक हादसे का नहीं रहता। सवाल यह होता है कि आखिर उस बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?
सत्य निकेतन की घटना ने इसी सवाल को एक बार फिर सामने ला दिया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित सत्य निकेतन में पीजी और किराये के कमरों में बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं। रविवार को एक पीजी वाली इमारत का ढह जाना और उसमें लोगों का दब जाना कोई सामान्य घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था की गंभीर विफलता है, जिसके भरोसे परिवार अपने बच्चों को राजधानी भेजते हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसी घटनाएं दिल्ली में बार-बार हो रही हैं। हर हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय होता है, टीमें बनाई जाती हैं, जांच के आदेश दिए जाते हैं, अवैध निर्माणों पर कार्रवाई का ऐलान होता है और कुछ दिनों बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। फिर किसी दूसरी जगह कोई इमारत गिरती है, कुछ लोग मरते हैं और व्यवस्था फिर वही बयान दोहराती है। सवाल यह है कि क्या सरकार और प्रशासन की भूमिका सिर्फ हादसे के बाद मुआवजा, जांच और कार्रवाई की घोषणा तक सीमित रह गई है?
सत्य निकेतन की घटना में स्थानीय लोगों के हवाले से यह बात सामने आई है कि इमारत के बेसमेंट में कई दिनों से तोड़फोड़ और खुदाई का काम चल रहा था। बेसमेंट कमजोर था और पानी भी भरा हुआ था। यदि यह जानकारी सही है तो सबसे पहले यह पता लगना चाहिए कि इतनी बड़ी इमारत में निर्माण या तोड़फोड़ का काम किन नियमों के तहत हो रहा था। क्या किसी अधिकारी ने मौके का निरीक्षण किया? क्या बिल्डिंग की संरचनात्मक सुरक्षा जांची गई? क्या निर्माण गतिविधि के लिए अनुमति थी? और सबसे बड़ा सवाल- अगर इमारत में खतरा था तो वहां छात्रों और दूसरे लोगों को रहने की अनुमति कैसे मिली?
सरकारी रिकॉर्ड में इमारत को खतरनाक घोषित नहीं किया गया था। यही बात पूरे मामले को और गंभीर बनाती है। किसी इमारत का सरकारी रिकॉर्ड में ‘खतरनाक’ नहीं होना उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकता। अगर जमीन पर इमारत की हालत खराब थी, उसमें अवैध बदलाव किए गए थे या उसकी संरचना से छेड़छाड़ की जा रही थी, तो जिम्मेदार विभागों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई?
दिल्ली में इस साल रोहिणी, सैदुलाजाब और अब सत्य निकेतन जैसे हादसे सामने आ चुके हैं। जुलाई में रोहिणी में निर्माणाधीन इमारत गिरने से तीन मजदूरों की मौत हुई। मई में सैदुलाजाब में पांच मंजिला इमारत ढहने से छह लोगों की जान चली गई। 2025 में भी वेलकम, पहाड़गंज और मुस्तफाबाद में इमारतों के ढहने से कई लोगों की मौत हुई थी। हर बार कारणों में जर्जर इमारत, अवैध निर्माण, निर्माण में लापरवाही या सुरक्षा नियमों की अनदेखी जैसी बातें सामने आती हैं।
तो फिर व्यवस्था बदली क्यों नहीं?
अगर किसी इलाके में दर्जनों अवैध या कमजोर इमारतें खड़ी हो रही हैं तो उन्हें बनने से पहले क्यों नहीं रोका जाता? अगर किसी इमारत में मंजिलें नियमों के खिलाफ बढ़ाई जा रही हैं तो संबंधित विभाग की नजर वहां क्यों नहीं जाती? अगर बेसमेंट में खुदाई हो रही है तो उसकी निगरानी कौन करता है? और अगर अधिकारियों को सब कुछ पता है तो कार्रवाई क्यों नहीं होती?
सरकारों को यह समझना होगा कि अवैध निर्माण केवल नक्शे का उल्लंघन नहीं है। यह सीधे-सीधे लोगों की जान का सवाल है। जब कोई अतिरिक्त मंजिल नियमों को ताक पर रखकर बनाई जाती है, जब बेसमेंट की खुदाई बिना सुरक्षा उपायों के होती है या जब जर्जर इमारतों में लोगों को रहने दिया जाता है, तब प्रशासनिक लापरवाही किसी न किसी दिन जानलेवा बन सकती है।
सत्य निकेतन जैसे इलाकों में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं। छात्रों के पास हर इमारत की संरचनात्मक जांच कराने की क्षमता या जानकारी नहीं होती। वे किराया देते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि जिस जगह उन्हें रहने के लिए कमरा दिया जा रहा है, वह सुरक्षित होगी। उनके माता-पिता भी यही मानकर अपने बच्चों को वहां भेजते हैं।
इसलिए सरकार को सिर्फ दोषी मालिक की तलाश तक मामला सीमित नहीं रखना चाहिए। अगर मालिक दोषी है तो उस पर कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए, लेकिन साथ-साथ यह भी तय होना चाहिए कि सरकारी तंत्र में कहां चूक हुई। किस अधिकारी ने निरीक्षण नहीं किया? किसने शिकायत को नजरअंदाज किया? किस स्तर पर निगरानी कमजोर रही? यदि कोई अधिकारी जिम्मेदार पाया जाता है तो उसके खिलाफ भी ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो भविष्य के लिए मिसाल बने।
मजिस्ट्रेट जांच का आदेश स्वागत योग्य है, लेकिन जांच की रिपोर्ट सिर्फ फाइल में बंद नहीं होनी चाहिए। उसकी सिफारिशों पर समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। दिल्ली में सभी पीजी और किराये की उन इमारतों का सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए जहां बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं। खासकर पुरानी इमारतों, बेसमेंट में चल रहे निर्माण और अतिरिक्त मंजिलों वाले भवनों की तत्काल जांच जरूरी है।
माता-पिता अपने बच्चों को दिल्ली पढ़ने भेजते हैं, मौत के मुंह में नहीं। राजधानी की सरकार और प्रशासन को यह भरोसा कायम करना होगा कि शिक्षा के लिए घर से हजारों किलोमीटर दूर आया बच्चा सुरक्षित है।
सत्य निकेतन में मलबा हट जाएगा। सड़क साफ हो जाएगी। जांच की रिपोर्ट भी शायद आ जाएगी। लेकिन जिन घरों में अब किसी बच्चे की वापसी का इंतजार हमेशा के लिए खत्म हो गया है, वहां का मलबा कभी नहीं हटेगा।
यही इस हादसे का सबसे बड़ा सवाल है- क्या सरकारें हादसों के बाद जागती रहेंगी, या हादसे होने से पहले लोगों की जान बचाने की जिम्मेदारी भी निभाएंगी?







