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मोदी का संदेश: टेक्नोलॉजी और जरूरी खनिजों को हथियार न बनाएं, मजबूत सप्लाई चेन के लिए BRICS बढ़ाए सहयोग

पीएम मोदी का संदेश
पीएम मोदी का संदेश
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Rishabh Rai

नई दिल्ली। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दूसरे और अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी नई चुनौतियों के बीच टेक्नोलॉजी और जरूरी खनिजों के इस्तेमाल को लेकर दुनिया को बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स को हथियार की तरह इस्तेमाल करना गलत है। इससे न केवल देशों के बीच अविश्वास बढ़ता है, बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक प्रगति प्रभावित होती है। प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स देशों से आपसी सहयोग बढ़ाने और ऐसी मजबूत सप्लाई चेन तैयार करने पर जोर दिया, जो किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर न हो।

भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन सदस्य देशों के नेताओं के सामूहिक फोटो सेशन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दोनों ओर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नजर आए। तस्वीर में तीनों नेताओं की मौजूदगी ने सम्मेलन के राजनीतिक महत्व को भी रेखांकित किया।

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अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने एक के बाद एक ऐसी चुनौतियां देखी हैं, जिन्होंने यह साबित किया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी गहराई से एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। कोरोना महामारी, जलवायु आपदाओं और सप्लाई चेन में आई रुकावटों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया के किसी एक हिस्से में पैदा हुआ संकट दूसरे देशों को भी प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने कहा कि ऐसे समय में देशों को अलग-अलग होकर नहीं, बल्कि सहयोग के रास्ते पर आगे बढ़ना होगा। वैश्विक आपूर्ति शृंखला को अधिक सुरक्षित, स्थिर और भरोसेमंद बनाना आज की बड़ी जरूरत है। इसके लिए BRICS देशों के बीच तकनीक, उत्पादन, व्यापार और महत्वपूर्ण संसाधनों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना होगा।

तकनीक और मिनरल्स को हथियार बनाने से नुकसान

प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से टेक्नोलॉजी और जरूरी खनिजों को लेकर चिंता जताई। दुनिया तेजी से डिजिटल और हरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक रक्षा तकनीक के लिए कई ऐसे खनिज जरूरी हैं, जिनकी आपूर्ति कुछ चुनिंदा देशों में केंद्रित है।

ऐसे में किसी देश द्वारा तकनीक या क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति को राजनीतिक दबाव के लिए इस्तेमाल किए जाने का असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। मोदी ने संकेत दिया कि इन संसाधनों का इस्तेमाल आर्थिक विकास और मानव कल्याण के लिए होना चाहिए, न कि उन्हें भू-राजनीतिक हथियार बनाया जाना चाहिए।

भारत लंबे समय से वैश्विक सप्लाई चेन को अधिक विविध बनाने की वकालत करता रहा है। कोरोना महामारी के दौरान चीन सहित कई देशों में उत्पादन और परिवहन बाधित होने से दुनिया को आवश्यक वस्तुओं और औद्योगिक कच्चे माल की आपूर्ति में मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। इसके बाद अमेरिका, यूरोप और एशिया की कई अर्थव्यवस्थाओं ने सप्लाई चेन में ‘डिकपलिंग’ और ‘डीरिस्किंग’ की रणनीतियों पर जोर दिया।

भारत का जोर इसके बजाय विविधीकरण और भरोसेमंद साझेदारों के बीच सहयोग पर रहा है। ब्रिक्स के मंच से मोदी का संदेश इसी नीति को व्यापक वैश्विक संदर्भ देता है।

महामारी और जलवायु संकट से मिली सीख

प्रधानमंत्री ने महामारी और जलवायु परिवर्तन को भी वैश्विक सहयोग की आवश्यकता से जोड़ते हुए कहा कि आज कोई भी देश पूरी तरह अलग-थलग रहकर अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित नहीं रख सकता। एक देश में पैदा हुआ स्वास्थ्य संकट, प्राकृतिक आपदा या व्यापारिक व्यवधान कुछ ही समय में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, सूखा, चक्रवात और गर्मी की चरम घटनाओं का असर खाद्य उत्पादन, ऊर्जा और परिवहन पर पड़ता है। इसका सीधा प्रभाव सप्लाई चेन पर पड़ता है और अंततः महंगाई बढ़ सकती है।

ऐसे में ब्रिक्स देशों के बीच आपदा प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला को लेकर सहयोग बढ़ाने की जरूरत है। भारत इसे ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं से भी जोड़ता है, क्योंकि विकासशील देशों पर वैश्विक संकटों का असर अक्सर ज्यादा पड़ता है।

ग्लोबल साउथ के लिए BRICS बना बड़ा मंच

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ग्लोबल साउथ के देशों का BRICS पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है। इसकी बड़ी वजह यह है कि इस मंच पर विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज को सुना जाता है और उनके अनुभवों को महत्व दिया जाता है।

उन्होंने कहा कि BRICS की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। सदस्य देशों की राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक संरचना, भौगोलिक स्थिति और विकास की जरूरतें अलग-अलग हैं, लेकिन इसके बावजूद वे साझा हितों के मुद्दों पर साथ काम कर सकते हैं।

BRICS का विस्तार भी इसी बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत है। पहले BRIC में केवल ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम BRICS हुआ। अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया के शामिल होने के बाद संगठन का आर्थिक और भौगोलिक दायरा काफी बढ़ गया है।

नई दिल्ली डेक्लरेशन में आतंकवाद पर साझा रुख

सम्मेलन के दौरान BRICS देशों ने नई दिल्ली डेक्लरेशन को मंजूरी दी। इसमें कई अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर सदस्य देशों की साझा स्थिति सामने आई। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू आतंकवाद से जुड़ा रहा। घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई। सदस्य देशों ने आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों की निंदा करते हुए आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकियों को सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की वकालत करता रहा है। नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद के खिलाफ साझा भाषा का आना भारत के लिए कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत की चिंता सिर्फ आतंकी हमलों तक सीमित नहीं है। उसका जोर आतंकवाद के पूरे इकोसिस्टम पर कार्रवाई करने पर रहा है, जिसमें आतंकियों की फंडिंग, भर्ती, प्रशिक्षण, सीमा पार नेटवर्क और सुरक्षित ठिकाने शामिल हैं।

पश्चिम एशिया पर भी नजर

BRICS घोषणा ऐसे समय आई है जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बना हुआ है। ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे सदस्य देशों के क्षेत्रीय हित और कई मुद्दों पर अलग-अलग रुख हैं। इसके बावजूद संगठन के भीतर साझा घोषणा पर सहमति बनना BRICS की कूटनीतिक क्षमता को दर्शाता है। हालांकि, BRICS में किसी भी मुद्दे पर सर्वसम्मति आसान नहीं होती। संगठन में चीन और रूस जैसी बड़ी शक्तियां हैं, वहीं भारत, ब्राजील और अन्य देशों की अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है। पश्चिम एशिया के मुद्दे पर भी सदस्य देशों की प्राथमिकताएं अलग हैं। इसके बावजूद आर्थिक सहयोग, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई, विकासशील देशों के हित और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे ऐसे क्षेत्र हैं जहां साझा जमीन तलाशने की कोशिश की जा सकती है।

मोदी की सात देशों के नेताओं से मुलाकात

BRICS सम्मेलन के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई द्विपक्षीय कार्यक्रम भी हैं। वह सात देशों के नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें करेंगे। इन बैठकों में द्विपक्षीय संबंधों, व्यापार, निवेश, ऊर्जा, तकनीक, रक्षा और क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है।

सम्मेलन के पहले दिन आयोजित रात्रिभोज में भी कई वैश्विक नेता शामिल हुए। हालांकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद इसमें शामिल नहीं हुए। अबू धाबी के क्राउन प्रिंस समिट में हिस्सा लेने के बाद अपने देश लौट गए थे, जबकि सूत्रों के मुताबिक शी जिनपिंग आराम करने के लिए होटल लौट गए थे।

शी जिनपिंग की मौजूदगी भारत के लिए विशेष महत्व रखती है। करीब सात साल बाद चीन के राष्ट्रपति भारत आए हैं। इससे पहले मोदी और शी के बीच द्विपक्षीय बातचीत भी हुई, जिसमें दोनों देशों के संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।

BRICS की बदलती भूमिका

BRICS अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। इसके विस्तार के साथ इसका राजनीतिक महत्व भी बढ़ा है। संगठन में दुनिया की कई बड़ी ऊर्जा उत्पादक अर्थव्यवस्थाएं हैं, जबकि भारत, चीन और ब्राजील जैसी अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक उत्पादन और उपभोक्ता बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

BRICS देशों की संयुक्त आबादी दुनिया की बड़ी हिस्सेदारी का प्रतिनिधित्व करती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी इनका योगदान लगातार बढ़ रहा है। इसलिए पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाली वैश्विक संस्थाओं के समानांतर या उनके भीतर सुधार के लिए दबाव बनाने में BRICS की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

हालांकि, संगठन के सामने आंतरिक मतभेद भी कम नहीं हैं। सदस्य देशों के बीच व्यापारिक हित, राजनीतिक प्राथमिकताएं और सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। ऐसे में BRICS की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन मतभेदों के बावजूद साझा एजेंडा को कितना आगे बढ़ा पाता है।

भारत का संदेश साफ

नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन के दूसरे दिन प्रधानमंत्री मोदी का संदेश तीन बड़े बिंदुओं पर केंद्रित रहा-टेक्नोलॉजी और जरूरी खनिजों का हथियारीकरण रोकना, मजबूत और भरोसेमंद सप्लाई चेन बनाना और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करना।

इसके साथ आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख और वैश्विक संकटों से निपटने के लिए सहयोग पर जोर ने भारत की प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया।

भारत के लिए BRICS एक ऐसा मंच है जहां वह एक तरफ चीन और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के साथ संवाद बनाए रख सकता है, वहीं दूसरी तरफ ग्लोबल साउथ के देशों के हितों को भी सामने ला सकता है। नई दिल्ली घोषणा और मोदी का संबोधन इसी संतुलित कूटनीति की तस्वीर पेश करते हैं।

अब चुनौती इन घोषणाओं को जमीन पर उतारने की है। अगर BRICS सदस्य देश तकनीक, जरूरी खनिज, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और सप्लाई चेन के क्षेत्र में वास्तविक सहयोग बढ़ाते हैं, तो यह मंच वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी का संदेश इसी दिशा में था-दुनिया की परस्पर निर्भरता को कमजोरी नहीं, सहयोग की ताकत बनाया जाए।

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