
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर को मुंबई में यह कहकर समान नागरिक संहिता (UCC) की बहस को फिर तेज कर दिया कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के नेतृत्व वाले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू कर दिया जाएगा। शाह का दावा है कि कई राज्यों में इसकी प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है और अगले तीन वर्षों में बाकी राज्यों को भी इसके दायरे में लाया जाएगा। लेकिन इस राजनीतिक लक्ष्य के साथ कई संवैधानिक, सामाजिक और सियासी सवाल भी खड़े होते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि UCC राष्ट्रीय जरूरत है तो इसे पूरे देश में एक साथ लागू क्यों नहीं किया जा रहा?
इसका जवाब संविधान की संघीय संरचना में छिपा है। संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता हासिल करने का प्रयास करने को कहता है। लेकिन यह प्रावधान नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है। अनुच्छेद 37 के तहत नीति निदेशक तत्व अदालतों द्वारा सीधे लागू नहीं कराए जा सकते। यानी संविधान UCC की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत देता है, लेकिन सरकारों को तत्काल इसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं करता।
दूसरी अहम बात यह है कि विवाह, तलाक, गोद लेना, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और विरासत जैसे व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषय संविधान की समवर्ती सूची में हैं। इसका अर्थ है कि इन पर संसद के साथ-साथ राज्य विधानसभाएं भी कानून बना सकती हैं। यही व्यवस्था राज्यों को अपने-अपने स्तर पर UCC की दिशा में कदम उठाने की संवैधानिक गुंजाइश देती है।
उत्तराखंड इस प्रयोग की शुरुआत करने वाला पहला राज्य बना। उसने 2024 में UCC कानून पारित किया और जनवरी 2025 से इसे लागू कर दिया। इसके बाद गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाए। गुजरात ने मार्च 2026 में UCC विधेयक पारित किया, जबकि असम ने मई और मध्य प्रदेश ने जुलाई 2026 में कानून की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। असम में जनजातीय समुदायों और छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों को विशेष रूप से बाहर रखा गया है।
यहीं से UCC की सबसे बड़ी राजनीतिक और संवैधानिक जटिलता सामने आती है। यदि अलग-अलग राज्य अलग-अलग प्रावधानों के साथ UCC लागू करते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर ‘समान नागरिक संहिता’ की अवधारणा कितनी समान रह जाएगी? उत्तराखंड और गुजरात के कानूनों में समानता हो सकती है, लेकिन राज्यों की सामाजिक परिस्थितियों और राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण अंतर भी संभव है। ऐसे में UCC एक समान राष्ट्रीय कानून के बजाय राज्यों के अलग-अलग कानूनों का समूह बन सकता है।
केंद्र के सामने राजनीतिक चुनौती भी कम नहीं है। NDA एक गठबंधन है और इसके कुछ सहयोगी दल UCC के विरोध में हैं। जनता दल (यूनाइटेड) की ओर से इसके खिलाफ आपत्ति सामने आ चुकी है। ऐसे में संसद में व्यापक सहमति के बिना राष्ट्रीय कानून लाना राजनीतिक रूप से कठिन हो सकता है। यही वजह है कि भाजपा ने फिलहाल राज्य-दर-राज्य रणनीति को अधिक व्यावहारिक रास्ते के तौर पर चुना है।
UCC की बहस में जनजातीय समुदायों को दी गई छूट भी महत्वपूर्ण है। पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत कई जनजातीय क्षेत्रों को उनके सामाजिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के संरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था मिली हुई है। विवाह, उत्तराधिकार और सामुदायिक जीवन से जुड़े पारंपरिक नियम इन समुदायों की पहचान का हिस्सा हैं। इसलिए UCC के दायरे से उन्हें बाहर रखने का तर्क सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़ा है। हालांकि, आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि यदि एक समान नागरिक संहिता इतनी जरूरी है तो कुछ समुदायों को इससे स्थायी या व्यापक छूट क्यों दी जा रही है?
सबसे तीखी बहस मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर है। UCC समर्थकों का तर्क है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण नागरिक अधिकारों में असमानता पैदा होती है और महिलाओं को समान अधिकार देने के लिए एक समान कानून जरूरी है। दूसरी ओर, मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों का कहना है कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को नजरअंदाज कर UCC लागू नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक अनुच्छेद 25 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 44 के तहत UCC की आकांक्षा के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
महिला अधिकारों का सवाल इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है। विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार में लैंगिक भेदभाव खत्म करना UCC के पक्ष में सबसे मजबूत तर्कों में है। लेकिन आलोचना यह है कि महिलाओं की समानता सुनिश्चित करने के लिए केवल एक समान कानून पर्याप्त नहीं; कानून की सामग्री, उसका न्यायपूर्ण स्वरूप और उसका निष्पक्ष क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है।
अब असली चुनौती 2029 के लक्ष्य की है। NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जरूर है, लेकिन इसके लिए कई राज्यों में विधायी प्रक्रिया, व्यापक सामाजिक संवाद और संवैधानिक परीक्षण से गुजरना होगा। साथ ही, अलग-अलग राज्यों में बने कानूनों की एकरूपता बनाए रखना भी कठिन होगा।
इसलिए UCC की मौजूदा तस्वीर को केवल ‘एक कानून’ की कहानी के रूप में देखना सही नहीं होगा। यह भारतीय संघवाद, धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और सांस्कृतिक अधिकारों के बीच संतुलन का बड़ा परीक्षण है। 2029 तक कितने राज्यों में UCC लागू होता है, यह महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह होगा कि लागू होने वाली संहिताएं वास्तव में कितनी समान, न्यायपूर्ण और सर्वस्वीकार्य हैं।






