
पेरिस से उठे विवाद में BAPS पर महिला स्टाफ को हटाने के आरोप, संस्था ने दावे को नकारा—सवाल यह कि प्रमाण कहाँ हैं?
पेरिस का एफिल टॉवर। दुनिया की पहचान बन चुका एक पर्यटन स्थल। और इसी जगह से जुड़ा एक विवाद अब धार्मिक संस्था, महिलाओं के सम्मान और मीडिया की जिम्मेदारी—तीनों पर सवाल खड़े कर रहा है।
विवाद का केंद्र है BAPS के संतों का एफिल टॉवर दौरा। कुछ मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्ट में यह दावा किया गया कि संतों के लिए महिला कर्मचारियों को हटाकर पुरुष कर्मचारियों की व्यवस्था की गई। आरोप गंभीर था—लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस दावे के पीछे ठोस प्रमाण मौजूद हैं?
BAPS से जुड़े पक्ष का कहना है कि संतों ने महिला कर्मचारियों को हटाने की कोई मांग नहीं की थी। संस्था की ओर से जिस लिखित पत्राचार का हवाला दिया जा रहा है, उसमें भी ऐसी मांग होने से इनकार किया गया है।
फिर विवाद शुरू कहाँ से हुआ?
BAPS के पक्ष के अनुसार, संतों के लिए सुबह के समय एक विशेष स्लॉट की व्यवस्था की गई थी। उद्देश्य बताया गया कि आम पर्यटकों के आने से पहले दौरा पूरा किया जा सके। यानी संस्था का दावा है कि उसकी मांग महिला कर्मचारियों को हटाने की नहीं, बल्कि निर्धारित समय पर निजी दौरे की थी।
दूसरी ओर, उस दिन एफिल टॉवर की सामान्य गतिविधियां ट्रेड यूनियन की हड़ताल से भी प्रभावित होने की बात सामने आई। ऐसे में सवाल उठता है—क्या हड़ताल, प्रबंधन की व्यवस्थाओं और संतों के दौरे को एक ही कहानी में जोड़कर पेश किया गया?
अगर महिला कर्मचारियों को हटाने का निर्देश वास्तव में दिया गया था, तो उसका आधिकारिक दस्तावेज क्या है?
क्या एफिल टॉवर प्रबंधन ने इसकी पुष्टि की?
क्या संबंधित कर्मचारियों ने इसकी शिकायत की?
या फिर एक प्रशासनिक व्यवस्था को सोशल मीडिया की व्याख्याओं ने एक बड़े धार्मिक विवाद में बदल दिया?
आरोप गंभीर हैं, इसलिए सबूत भी गंभीर होने चाहिए
नारी सम्मान पर सवाल उठाना गलत नहीं है। बल्कि महिलाओं के साथ भेदभाव की किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
लेकिन यही सिद्धांत दूसरी तरफ भी लागू होता है।
किसी संस्था या संत पर महिला-विरोधी आचरण का आरोप लगाने से पहले प्रमाण सामने रखना भी उतना ही जरूरी है।
मीडिया का काम केवल वायरल दावे को दोहराना नहीं, बल्कि उसके पीछे का दस्तावेज तलाशना है।
विवाद के दौरान कुछ सोशल मीडिया अकाउंट्स और कथित तौर पर कुछ मीडिया हस्तियों की टिप्पणियों में BAPS के संतों की शिक्षा और संस्कारों पर भी सवाल उठाए गए। संस्था का कहना है कि उसके अनेक संत उच्च शिक्षित हैं और विभिन्न पेशेवर तथा शैक्षणिक क्षेत्रों से आते हैं।
यह तथ्य अपने आप में किसी आरोप को सही या गलत साबित नहीं करता। लेकिन इतना जरूर बताता है कि किसी पूरे समूह को बिना तथ्य जाने ‘जाहिल’ या ‘गंवार’ बताना पत्रकारिता की कसौटी पर अलग सवाल खड़ा करता है।
अब असली लड़ाई तथ्य की है
BAPS अपने धार्मिक और सामाजिक कार्यों को महिलाओं के सम्मान और सामाजिक उत्थान से जोड़ता रहा है। संस्था प्रमुख स्वामी महाराज और स्वामिनारायण परंपरा के महिला-संबंधी विचारों का हवाला देकर अपने पक्ष को सामने रख रही है।
लेकिन इतिहास और धार्मिक विचारों की बहस अपनी जगह है।
एफिल टॉवर की उस सुबह का सवाल उससे अलग है।
क्या महिला स्टाफ को हटाने की मांग की गई थी या नहीं?
अगर की गई थी—तो दस्तावेज सामने आएं।
अगर नहीं की गई थी—तो आरोप लगाने वालों को अपने दावे का आधार बताना चाहिए।
क्योंकि नारी सम्मान के नाम पर बहस हो सकती है, सवाल हो सकते हैं, जांच हो सकती है—लेकिन फैसला सबूतों के आधार पर ही होना चाहिए।
एफिल टॉवर विवाद में फिलहाल सबसे जरूरी चीज कोई सनसनी नहीं, बल्कि वह दस्तावेज है जो यह तय कर सके कि उस सुबह वास्तव में हुआ क्या था।








