
भारत में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है। स्वतंत्रता के 79 वर्ष से अधिक समय बाद भी देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे नागरिक मामलों में एक समान कानून लागू नहीं है। संविधान के नीति निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य से अपेक्षा की गई है कि वह सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करे। हालांकि यह प्रावधान सीधे तौर पर लागू किए जाने योग्य मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन संविधान निर्माताओं की उस सोच को जरूर सामने रखता है जिसमें नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था की कल्पना की गई थी।
इस दिशा में उत्तराखंड ने सबसे बड़ा कदम उठाया। 27 जनवरी 2025 को उत्तराखंड समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना। राज्य सरकार के अनुसार, यूसीसी का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान नियम लागू करना है। कानून में विवाह के पंजीकरण को अनिवार्य बनाया गया है। लिव-इन संबंधों के पंजीकरण से जुड़े प्रावधान भी इसमें शामिल हैं। बहुविवाह पर रोक और उत्तराधिकार के मामलों में समान नियमों की व्यवस्था को भी कानून की प्रमुख विशेषताओं में गिना जाता है। हालांकि अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।
उत्तराखंड का प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब दूसरे राज्यों के सामने एक व्यावहारिक उदाहरण मौजूद है। इससे यह आकलन किया जा सकेगा कि समान नागरिक कानून जमीन पर किस तरह काम करता है, नागरिकों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और प्रशासनिक स्तर पर किन सुधारों की जरूरत पड़ती है। केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है; उसकी प्रक्रिया नागरिकों के लिए सरल और सुलभ होना भी जरूरी है।
गोवा का उदाहरण भी इस बहस में खास महत्व रखता है। वहां पुर्तगाली शासन के समय लागू सिविल कोड संशोधित रूप में आज भी लागू है। विवाह, संपत्ति और पारिवारिक मामलों में समान नागरिक व्यवस्था के कारण गोवा को लंबे समय से भारत में कॉमन सिविल कोड का उदाहरण माना जाता रहा है। हालांकि गोवा की ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियां पूरे देश से अलग हैं, इसलिए उसके मॉडल को ज्यों का त्यों पूरे भारत में लागू करना आसान नहीं होगा।
दूसरी ओर गुजरात और मध्य प्रदेश में भी यूसीसी की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। गुजरात में विधानसभा से विधेयक पारित होने के बाद इसके नियमों और प्रशासनिक व्यवस्था की तैयारी महत्वपूर्ण चरण है। मध्य प्रदेश में भी विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ी है। राजस्थान में यूसीसी को लेकर प्रारंभिक तैयारी और विधायी कदमों की चर्चा है। वहीं पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में फिलहाल यह मुद्दा मुख्य रूप से राजनीतिक बहस का हिस्सा है।
यही स्थिति बताती है कि भारत में यूसीसी की राह एक जैसी नहीं है। कुछ राज्य इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जबकि कुछ अभी इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों पर चर्चा कर रहे हैं। इसका एक कारण भारत की विविध सामाजिक संरचना भी है। देश में अलग-अलग धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों के साथ-साथ क्षेत्रीय और जनजातीय परंपराओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
यूसीसी के समर्थकों का सबसे मजबूत तर्क यही है कि नागरिकों के व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों में कानून धर्म के आधार पर अलग-अलग नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि समान कानून से महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिल सकती है, विवाह और तलाक की प्रक्रियाओं में समानता आ सकती है और उत्तराधिकार तथा संपत्ति से जुड़े विवादों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार हो सकता है। दूसरी तरफ इसकी आलोचना करने वालों की चिंता यह है कि समानता लागू करने के नाम पर धार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
यही यूसीसी की सबसे बड़ी चुनौती है- समानता और विविधता के बीच संतुलन। भारत की संवैधानिक व्यवस्था नागरिकों को समान अधिकार देती है, लेकिन साथ ही विभिन्न समुदायों और जनजातीय समूहों की विशिष्ट परिस्थितियों को भी पहचानती है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर यूसीसी की कोई भी व्यवस्था बनाते समय संविधान की मूल भावना और सामाजिक वास्तविकताओं दोनों का ध्यान रखना होगा।
इसके अलावा यूसीसी को केवल राजनीतिक नारे में बदल देना भी उचित नहीं होगा। यह कानून सीधे तौर पर नागरिकों के निजी जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को प्रभावित करेगा। इसलिए व्यापक सार्वजनिक विमर्श, विशेषज्ञों की राय और प्रभावित समुदायों के साथ संवाद बेहद जरूरी है। कानून जितना स्पष्ट होगा और उसकी प्रक्रिया जितनी सरल होगी, उसका क्रियान्वयन उतना ही प्रभावी होगा।
आने वाले वर्षों में उत्तराखंड का अनुभव दूसरे राज्यों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है। यदि वहां यूसीसी के सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं तो अन्य राज्यों में इसे अपनाने की मांग और तेज हो सकती है। लेकिन यदि प्रशासनिक या कानूनी स्तर पर समस्याएं सामने आती हैं तो उनमें सुधार करके आगे बढ़ना होगा।
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य केवल अलग-अलग कानूनों को एक कानून में बदलना नहीं होना चाहिए। इसका वास्तविक लक्ष्य हर नागरिक को समान कानूनी अधिकार, समान सुरक्षा और समान न्याय उपलब्ध कराना होना चाहिए। भारत जैसे विशाल और विविध देश में यह काम आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं। जरूरत केवल इतनी है कि यूसीसी की बहस राजनीतिक टकराव से ऊपर उठे और संविधान, समानता, न्याय तथा नागरिक अधिकारों के व्यापक दृष्टिकोण से आगे बढ़े। तभी ‘समान नागरिक संहिता’ वास्तव में समानता का कानून बन पाएगी, न कि केवल एक राजनीतिक मुद्दा।








