
रांची में 10 अगस्त को नौकरी की परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने झारखंड सरकार पर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने छात्रों पर बल प्रयोग को गलत बताते हुए सरकार से जवाब मांगा। लेकिन इस बयान के साथ ही सियासी बहस का एक पुराना सवाल फिर सामने आ गया- क्या राहुल गांधी की ‘नैतिक राजनीति’ सिर्फ विरोधियों के खिलाफ है या सहयोगी सरकारों और गठबंधन दलों पर भी उसी तरह लागू होती है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि झारखंड में सत्ता JMM के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास है और कांग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा है। ऐसे में बीजेपी समेत विपक्षी दल राहुल गांधी के रुख को ‘दोहरे मापदंड’ से जोड़ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि राहुल गांधी जब किसी मुद्दे को नैतिकता का सवाल बनाते हैं, तो वह सिर्फ विपक्षी दलों को नहीं, बल्कि कई बार अपने सहयोगियों और अपनी ही पार्टी को भी असहज स्थिति में डाल देता है।
2013 का अध्यादेश और मनमोहन सरकार
राहुल गांधी की ‘नैतिक राजनीति’ की सबसे चर्चित मिसाल 2013 की मानी जाती है। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार थी और राहुल गांधी कांग्रेस के उपाध्यक्ष थे। सरकार एक अध्यादेश लेकर आई थी, जिसका संबंध दोषी ठहराए गए सांसदों और विधायकों की सदस्यता बचाने से था।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने इस अध्यादेश का खुलकर विरोध किया और इसे सार्वजनिक रूप से फाड़ दिया। उन्होंने इसे ‘बिल्कुल बकवास’ करार दिया। यह कदम इसलिए बड़ा था क्योंकि राहुल गांधी ने अपनी ही सरकार के फैसले को सार्वजनिक मंच से खारिज किया था।
उस समय इस कदम को राहुल गांधी की राजनीतिक बेबाकी और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख के तौर पर पेश किया गया। लेकिन आलोचकों ने इसे सरकार और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की राजनीतिक authority को कमजोर करने वाला कदम भी बताया।
बाद के वर्षों में बीजेपी ने इस घटना को राहुल गांधी के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। बीजेपी का तर्क रहा कि जिस समय राहुल गांधी ने राजनीतिक नैतिकता का हवाला देकर अपनी ही सरकार के फैसले का विरोध किया, उसी दौर के कई राजनीतिक सहयोगी बाद में कांग्रेस के साथ गठबंधन का हिस्सा बने।
लालू यादव का मुद्दा और आज का गठबंधन
2013 के अध्यादेश की चर्चा लालू प्रसाद यादव के संदर्भ में भी होती है। चारा घोटाले के एक मामले में सजा के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति प्रभावित हुई थी। राहुल गांधी के अध्यादेश विरोध को तब लालू यादव समेत कई सहयोगियों के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना गया।
लेकिन समय के साथ राजनीति बदली। लालू यादव की पार्टी RJD आज कांग्रेस की महत्वपूर्ण सहयोगी है और विपक्षी गठबंधन की राजनीति में दोनों दल एक साथ दिखाई देते हैं।
यही विरोधाभास बीजेपी को राहुल गांधी पर हमला करने का मौका देता है। बीजेपी पूछती है कि जिस राजनीति के खिलाफ राहुल गांधी कभी खड़े हुए थे, उसी राजनीति से जुड़े नेताओं और दलों के साथ आज कांग्रेस गठबंधन क्यों कर रही है?
हालांकि कांग्रेस का तर्क अलग है। कांग्रेस समर्थकों के मुताबिक गठबंधन राजनीति में अलग-अलग दलों के साथ काम करना किसी पुराने मुद्दे पर अपनी वैचारिक स्थिति बदलने के बराबर नहीं है।
2G विवाद और DMK से रिश्ते
राहुल गांधी की राजनीति को लेकर DMK के साथ रिश्तों का उदाहरण भी दिया जाता है। UPA के दौर में 2G स्पेक्ट्रम मामला कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक संकट था। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा और DMK नेता कनिमोझी इस मामले में आरोपी बनाए गए थे।
बाद में विशेष अदालत ने 2017 में ए. राजा, कनिमोझी समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया। इसके बाद राजनीतिक समीकरणों में भी बदलाव आया। आज DMK विपक्षी गठबंधन की अहम सहयोगी है।
लेकिन समय-समय पर कांग्रेस और DMK के बीच बयानबाजी ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की बात करने वाले दल राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ क्यों खड़े हो जाते हैं?
यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी की ‘नैतिक राजनीति’ और गठबंधन की ‘व्यावहारिक राजनीति’ आमने-सामने आती है।
राहुल की राजनीति-नैतिकता बनाम गठबंधन धर्म?
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच राहुल गांधी की राजनीति को लेकर एक धारणा रही है कि वह कई मुद्दों पर समझौता करने के बजाय स्पष्ट और आक्रामक रुख अपनाते हैं। भ्रष्टाचार, संस्थाओं की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर वह लगातार सरकार को घेरते रहे हैं।
समस्या तब पैदा होती है जब यही नैतिक मानदंड सहयोगी दलों पर भी लागू होने लगते हैं।
गठबंधन राजनीति में हर दल की अपनी क्षेत्रीय मजबूरियां, राजनीतिक प्राथमिकताएं और वोट बैंक होते हैं। ऐसे में किसी सहयोगी दल की सरकार या नेता पर सार्वजनिक हमला उस गठबंधन की एकता के लिए चुनौती बन सकता है।
यही वजह है कि बीजेपी राहुल गांधी के खिलाफ ‘दोहरे मापदंड’ का आरोप लगाती रही है। बीजेपी का कहना है कि राहुल गांधी विपक्ष में रहते हुए नैतिकता की बात करते हैं, लेकिन सत्ता या गठबंधन की राजनीति में वही मानदंड बदल जाते हैं।
‘विष पीने’ की राजनीति पर भी विवाद
INDIA गठबंधन के भीतर मतभेदों को लेकर राहुल गांधी के एक बयान की भी चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने गठबंधन के भीतर आलोचना और राजनीतिक तनाव को भगवान शिव द्वारा विष पीने की उपमा से जोड़ा था।
आलोचकों ने इसी उदाहरण को पलटकर राहुल गांधी के खिलाफ इस्तेमाल किया और सवाल उठाया कि गठबंधन में पैदा होने वाले राजनीतिक तनाव को खत्म करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
यह विवाद इस बात को दिखाता है कि विपक्षी गठबंधन में सिर्फ बीजेपी के खिलाफ साझा रणनीति बनाना पर्याप्त नहीं है। सहयोगी दलों के बीच भरोसा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
कांग्रेस के लिए असली चुनौती
राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका यही बेबाक और टकराव वाला अंदाज है। वह कई बार अपनी पार्टी के पारंपरिक राजनीतिक तौर-तरीकों से अलग जाकर सीधे मुद्दे पर हमला करते हैं। इससे उनके समर्थकों के बीच उनकी छवि एक स्पष्टवादी और निडर नेता की बनती है।
लेकिन यही शैली कांग्रेस के लिए चुनौती भी बन जाती है।
अगर राहुल गांधी किसी सहयोगी दल की सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठाते हैं, तो सवाल सिर्फ उस मुद्दे तक सीमित नहीं रहता। उसका असर सीटों के बंटवारे, गठबंधन की एकता और भविष्य की चुनावी रणनीति पर भी पड़ सकता है।
यानी राहुल गांधी के सामने दो रास्ते हैं—एक तरफ अपनी नैतिक और वैचारिक राजनीति को मजबूती से आगे बढ़ाना और दूसरी तरफ गठबंधन धर्म के तहत सहयोगियों की राजनीतिक मजबूरियों को समझना।
आखिर नैतिकता की कीमत कौन चुकाएगा?
रांची की घटना ने इसी बहस को फिर जिंदा कर दिया है। छात्रों पर पुलिस कार्रवाई गलत है या सही, यह जांच और तथ्यों से तय होगा। लेकिन राहुल गांधी के बयान ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है।
क्या एक नेता की नैतिकता उसके व्यक्तिगत राजनीतिक ब्रांड को मजबूत करती है या पूरी पार्टी और गठबंधन के लिए मुश्किलें पैदा करती है?
राहुल गांधी के समर्थकों के लिए यही नैतिकता उनकी ताकत है। आलोचकों के लिए यही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास।
सियासत में सिर्फ नैतिकता से राजनीति नहीं चलती और सिर्फ समझौते से भी नहीं। असली चुनौती दोनों के बीच संतुलन बनाने की है। राहुल गांधी अगर अपनी नैतिक राजनीति को गठबंधन की व्यावहारिक जरूरतों के साथ जोड़ पाते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए ताकत बन सकती है। लेकिन अगर नैतिकता और गठबंधन धर्म बार-बार आमने-सामने आते रहे, तो इसकी राजनीतिक कीमत सिर्फ राहुल गांधी नहीं, पूरी कांग्रेस और उसके सहयोगियों को चुकानी पड़ सकती है।







