
हाँ कंगना जी… आपने बिल्कुल सही कहा होगा। युवा गटर के ही हैं। आखिर गटर में उतरकर ही तो सीवर साफ़ करने वाले भी युवा हैं। बाढ़ आए तो कमर तक पानी में उतरकर लोगों की जान बचाने वाले भी युवा हैं। सीमा पर दुश्मन की गोलियों के सामने सीना तानकर खड़े होने वाले भी युवा हैं। रात-रात भर अस्पतालों में ड्यूटी देने वाले डॉक्टर भी युवा हैं। खेतों में पसीना बहाने वाले किसान भी युवा हैं। स्टार्टअप खड़े करने वाले, ओलंपिक में पदक जीतने वाले, इसरो में रॉकेट बनाने वाले, टैक्स देने वाले, देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाले- ये सब भी युवा ही हैं।
अगर यही “गटर” हैं, तो शायद देश की सबसे बड़ी ताकत भी यही “गटर” है।
अफसोस इस बात का नहीं कि एक बयान आया। अफसोस इस बात का है कि देश की सबसे बड़ी आबादी को संबोधित करते समय शब्दों का वजन भूल जाना अब सामान्य होता जा रहा है। कभी युवाओं को नासमझ कहा जाता है, कभी उन्हें ट्रोल बताया जाता है, कभी उन्हें भटका हुआ कहा जाता है। अब अगर पूरे युवा वर्ग पर ऐसी टिप्पणी हो जाए, तो सवाल पूछना तो बनता है।
कंगना जी, एक बात बताइए। चुनाव के समय यही युवा “देश का भविष्य” कैसे बन जाते हैं? रैलियों में इन्हीं से तालियाँ बजवाई जाती हैं। सोशल मीडिया पर इन्हीं से ट्रेंड चलवाए जाते हैं। पहली बार वोट डालने वाले युवाओं को सम्मान दिया जाता है। लेकिन जैसे ही वही युवा सवाल पूछने लगते हैं, सरकार से जवाब मांगते हैं या किसी मुद्दे पर सड़क पर उतरते हैं, उनके लिए भाषा अचानक बदल क्यों जाती है?
लोकतंत्र में जनता सवाल पूछेगी। यही उसका अधिकार है। अगर जनता सवाल पूछना छोड़ दे, तो लोकतंत्र केवल चुनाव का उत्सव बनकर रह जाएगा।
याद कीजिए, इस देश में जब-जब बड़े जनआंदोलन हुए, उनमें सबसे आगे युवा ही थे। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तक, विश्वविद्यालयों से लेकर गांवों तक- हर दौर में युवाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इतिहास यही बताता है कि युवा केवल भीड़ नहीं होते, वे बदलाव की ताकत भी होते हैं।
राजनीति का एक पुराना नियम है- जनता को कभी कम मत समझिए। जनता देर से जवाब देती है, लेकिन जब देती है तो इतिहास बदल देती है। सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को यह बात शायद सबसे अच्छी तरह याद रखनी चाहिए।
एक और बात। अगर किसी युवा की भाषा गलत है, अगर सोशल मीडिया पर कुछ लोग अभद्र हैं, तो उनकी आलोचना कीजिए। लेकिन करोड़ों युवाओं को एक ही तराजू में मत तौलिए। क्या कुछ नेताओं की गलती से पूरी राजनीति को दोषी ठहरा दिया जाता है? नहीं। फिर कुछ लोगों की हरकतों से पूरी पीढ़ी का अपमान क्यों?
आज का युवा पहले से ज्यादा जागरूक है। वह पढ़ता है, आंकड़े देखता है, सवाल पूछता है, बहस करता है। वह किसी भी दल का अंध समर्थक बनने को तैयार नहीं। शायद यही बात कुछ लोगों को असहज करती है। लेकिन लोकतंत्र में जागरूक नागरिक समस्या नहीं, सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
कंगना जी, राजनीति में शब्दों की उम्र बहुत लंबी होती है। फिल्मों के संवाद पर तालियाँ बज सकती हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बोले गए संवाद इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। सांसद के शब्द केवल व्यक्तिगत राय नहीं होते, वे उस संस्था की गरिमा से भी जुड़े होते हैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है।
आज देश का युवा रोजगार चाहता है। बेहतर शिक्षा चाहता है। पारदर्शी परीक्षाएँ चाहता है। सुरक्षित भविष्य चाहता है। महंगाई पर जवाब चाहता है। विकास में अपनी हिस्सेदारी चाहता है। उसे भाषण कम और समाधान ज्यादा चाहिए। अगर उसकी चिंताओं का जवाब तंज से मिलेगा, तो असंतोष बढ़ेगा, संवाद नहीं।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहाँ जनता अंतिम निर्णायक होती है। वही जनता जो चुनाव में वोट देती है। वही जनता जो नेताओं को संसद भेजती है। वही जनता जो समय आने पर उन्हें वापस भी भेज देती है। इसलिए किसी भी जनप्रतिनिधि को यह नहीं भूलना चाहिए कि सम्मान एकतरफा नहीं होता।
युवा देश का भविष्य हैं- यह केवल चुनावी नारा नहीं होना चाहिए। यह व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। अगर युवाओं से असहमति है, तो उनसे संवाद कीजिए। उन्हें समझाइए। लेकिन उनका अपमान मत कीजिए।
भारत का युवा गटर नहीं है। वह इस देश की ऊर्जा है। उसमें कमियाँ भी हैं, संभावनाएँ भी। लेकिन अगर उसकी आवाज़ को तिरस्कार मिलेगा, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होगी।
सत्ता बदलती रहती है, चेहरे बदलते रहते हैं, बयान भी बदल जाते हैं। लेकिन देश का युवा हर दौर में मौजूद रहता है। वही कल भी था, वही आज भी है और वही कल भारत की दिशा तय करेगा।
इसलिए शायद समय आ गया है कि राजनीति अपनी भाषा पर फिर से विचार करे। क्योंकि लोकतंत्र में विरोधी से लड़कर चुनाव जीता जा सकता है, लेकिन अपनी ही युवा पीढ़ी का सम्मान खोकर भविष्य नहीं जीता जा सकता।







