
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता हमेशा से सत्ता की चाबी रहे हैं। यही वजह है कि जैसे-जैसे 2027 का विधानसभा चुनाव करीब आ रहा है, राजनीतिक दल अपने-अपने सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में जुट गए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने संत रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर ‘श्री गुरु रविदास महाराज समरसता संकल्प अभियान’ शुरू करने का फैसला किया है। यह केवल एक धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक संदेश भी छिपा है। पार्टी संत रविदास के सामाजिक समरसता, समानता और भाईचारे के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने की बात कर रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे दलित समाज, विशेषकर गैर-जाटव वर्ग, के बीच अपनी पकड़ को और मजबूत करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21 प्रतिशत है और उसका प्रभाव केवल 84 अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है। करीब 150 से अधिक विधानसभा सीटों पर दलित मतदाता चुनावी नतीजे तय करने की स्थिति में हैं। यही कारण है कि कोई भी दल इस वर्ग की अनदेखी करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पहली बार गैर-जाटव दलितों के बीच बड़ी पैठ बनाई। पोस्ट पोल सर्वे बताते हैं कि जहां जाटव समुदाय का अधिकांश वोट बहुजन समाज पार्टी के साथ बना रहा, वहीं गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर आया। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा को अभूतपूर्व बहुमत मिला। 2022 में यह रुझान और मजबूत दिखाई दिया। बसपा का वोट बैंक लगातार कमजोर हुआ और भाजपा ने गैर-जाटव दलितों के बीच अपना प्रभाव बढ़ा लिया।
हालांकि 2024 के लोकसभा चुनावों ने भाजपा के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी। गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा इंडिया गठबंधन की ओर जाता दिखाई दिया। यह बदलाव भाजपा के लिए चेतावनी था कि यदि दलित वर्ग में उसकी पकड़ कमजोर हुई तो 2027 का चुनाव आसान नहीं होगा। ऐसे में संत रविदास के नाम पर समरसता अभियान राजनीतिक दृष्टि से समयानुकूल और रणनीतिक दोनों माना जा सकता है।
सवाल यह नहीं है कि राजनीतिक दल सामाजिक महापुरुषों के विचारों को जनता तक क्यों पहुंचा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह प्रयास केवल चुनावी मौसम तक सीमित रहेगा या वास्तव में सामाजिक न्याय और समान अवसर की दिशा में ठोस पहल भी दिखाई देगी। संत रविदास ने जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज का सपना देखा था। यदि उनके विचारों को केवल चुनावी नारों तक सीमित कर दिया गया तो यह उनके संदेश के साथ न्याय नहीं होगा।
राजनीति में प्रतीकों का महत्व हमेशा रहा है। भाजपा ने पिछले एक दशक में डॉ. भीमराव आंबेडकर, भगवान बिरसा मुंडा, महाराजा सुहेलदेव और अब संत रविदास जैसे महापुरुषों को अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया है। इससे उसे सामाजिक विस्तार का लाभ भी मिला। लेकिन आज का मतदाता पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। वह केवल प्रतीकों से नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सम्मान जैसे मुद्दों पर भी सरकारों का मूल्यांकन करता है।
2027 के चुनाव में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक सामाजिक गठबंधन को बनाए रखना है। वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी दलित समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में लगी हैं। बसपा, जो कभी दलित राजनीति की सबसे मजबूत आवाज थी, आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित समाज सबसे बड़ा चुनावी केंद्र बनने जा रहा है। यह अभियान भाजपा को कितना लाभ पहुंचाता है, इसका उत्तर चुनावी नतीजे देंगे। लेकिन लोकतंत्र की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि दलित समाज केवल चुनावी समीकरण न बने, बल्कि विकास और सम्मान की राजनीति का वास्तविक केंद्र बने।







