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सड़क पर खबर, दफ़्तर में ‘एजेंडा’

ऋषभ के कलम से
ऋषभ के कलम से
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Written by
Rishabh Rai

मैं पिछले कई दिनों से जंतर-मंतर पर चल रहा वो पूरा नज़ारा देख रहा हूँ, जहाँ तेज़ धूप भी है, बारिश भी है, भीड़ भी है और धक्का-मुक्की भी अपनी पूरी अव्यवस्था के साथ मौजूद है। वहाँ पत्रकार खड़े रहते हैं- नारे लगाने के लिए नहीं, किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि बस सही और जल्दी रिपोर्टिंग करने के लिए। उनके हाथ में कैमरा होता है, नोटबुक होती है, मोबाइल होता है और सबसे ऊपर एक प्रोफेशनल जिम्मेदारी होती है। वे वहाँ जाकर सिर्फ फीड भेजते हैं, घटनाओं का सीधा हाल बताते हैं और वही दिखाते हैं जो सच में सामने हो रहा होता है। लेकिन असली दिक्कत तब शुरू होती है जब वही फीड दफ्तर में बैठे हम जैसे लोग अपनी सुविधा, अपनी पसंद, अपनी सोच और अपने एजेंडे के हिसाब से काट-छाँट देते हैं। हम सच को थोड़ा मोड़ देते हैं, खबर को थोड़ा रंग देते हैं और फिर बड़े आराम से उसे “एंगल” का नाम दे देते हैं।

आज जब जंतर-मंतर पर पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है, तो सबसे पहले यही सवाल उठना चाहिए कि उनका कसूर आखिर क्या है? क्या बस इतना कि वे मौके पर मौजूद थे? क्या इसलिए कि वे लोगों की आवाज़ रिकॉर्ड कर रहे थे? क्या इसलिए कि उन्होंने वही दिखाया जो सामने था- न कम, न ज़्यादा? पत्रकार किसी आंदोलन का हिस्सा नहीं होते; वे उस आंदोलन के सामने खड़ी सच्चाई के गवाह होते हैं। अगर गवाह पर ही हमला होगा, तो फिर सच की अदालत में बयान कौन देगा? अगर कैमरे पर ही लाठी चलेगी, तो फिर जनता तक तस्वीर कौन पहुँचाएगा?

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और सच कहूँ, तो कभी-कभी अपने ही पेशे पर शर्म भी आती है। क्योंकि मैं जानता हूँ कि ज़मीन पर पसीना बहाने वाला रिपोर्टर किन हालात में काम करता है और दफ्तर में बैठा “एजेंडा सेट” करने वाला दिमाग कितनी आसानी से खबर को अपनी मर्ज़ी से मोड़ देता है। जब सीनियर कहते हैं, “आज इस मुद्दे पर लाइन बनाओ,” या “इस खबर को थोड़ा और धारदार करो,” तब अंदर कहीं कुछ अजीब-सा लगने लगता है। क्योंकि तब साफ हो जाता है कि हम खबर नहीं बना रहे, बल्कि अपनी सुविधा के हिसाब से कहानी गढ़ रहे हैं। जो पत्रकार धूल, धक्का, धमकी और दबाव के बीच सच लेकर आता है, उसकी मेहनत को हम एसी कमरे में बैठकर कैंची से काट देते हैं। उसकी रिपोर्ट को तोड़-मरोड़कर, अपने हिसाब से मसाला लगाकर, कभी सनसनी बना देते हैं, कभी साजिश, कभी तमाशा- और फिर पूरे भरोसे से कहते हैं कि यही “न्यूज़” है।

लेकिन पत्रकारिता का असली मतलब ये नहीं है। उसका असली चेहरा वो रिपोर्टर है, जो दिन-रात एक करके किसी गरीब की आवाज़ उठाता है, किसी मज़दूर की टूटी चप्पल, किसी किसान की सूखी आँख, किसी महिला की चुप्पी, किसी बेरोज़गार की बेबसी और किसी आम इंसान की रोज़ की लड़ाई को कैमरे में दर्ज करता है। पत्रकार का दिल अगर कहीं धड़कता है, तो वो आम आदमी के लिए धड़कता है। उसे पता होता है कि सत्ता की चमक के पीछे कितनी धूल छिपी होती है और उस धूल में कितनी ज़िंदगियाँ दबी होती हैं। इसलिए जब वो खबर लाता है, तो सिर्फ सूचना नहीं लाता—वो समाज का आईना लाता है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि पत्रकारों को सिर्फ सहानुभूति नहीं, बल्कि सुरक्षा और सम्मान मिले। और उससे भी ज़्यादा ज़रूरत इस बात की है कि दफ्तरों में बैठे वे लोग, जो खबर को अपने एजेंडे की भाषा में बदल देते हैं, खुद को आईने में देखें। क्योंकि असली खतरा सिर्फ सड़क पर नहीं है; असली खतरा उस कमरे में भी है जहाँ खबर को काटा जाता है, मोड़ा जाता है और फिर बड़े भरोसे के साथ परोसा जाता है। अगर पत्रकारिता को बचाना है, तो रिपोर्टर की मेहनत को बचाना होगा। अगर सच को बचाना है, तो फीड को प्रचार में बदलने वाली सोच पर लगाम लगानी होगी

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