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सरकार की चुप्पी: लोकतंत्र की जवाबदेही और जनता की जेब पर खतरा

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Written by
Rishabh Rai

पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध ने केवल क्षेत्रीय तनाव नहीं बढ़ाया है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक स्थिति पर भी गंभीर खतरे पैदा किए हैं। तेल की कीमतों में उछाल, भारतीय शेयर बाजार में लगातार गिरावट और रुपया के रिकॉर्ड कमजोर स्तर तक जाने जैसी घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि यह संकट सिर्फ ‘दूर की बात’ नहीं है।

फिर भी केंद्र सरकार संसद में इस मुद्दे पर खुली बहस से लगातार बच रही है। विपक्ष और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह बचने की रणनीति न केवल लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि आम जनता की चिंता और निवेशकों की सुरक्षा को नजरअंदाज करना है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और खरगे लगातार मांग कर रहे हैं कि अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष और इसके भारत पर पड़ने वाले प्रभावों पर संसद में बहस हो।

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सरकार इसका उत्तर देती है कि यह ‘संवेदनशील कूटनीतिक मामला’ है। लेकिन सवाल उठता है- अगर यह मुद्दा संवेदनशील है तो संसद में क्यों नहीं चर्चा की जा सकती? आखिर लोकतंत्र का मतलब ही यह है कि जनता के प्रतिनिधि यह पूछ सकें कि सरकार की विदेश नीति और आर्थिक तैयारी इस संकट के लिए कितनी प्रभावी है।

वास्तविकता यह है कि सरकार संसद में बहस से इसलिए बच रही है क्योंकि यह बहस उनके लिए राजनीतिक खतरे का काम कर सकती है। पश्चिम एशिया का यह संकट सीधे भारतीय तेल आपूर्ति और वैश्विक व्यापार से जुड़ा है। तेल की बढ़ती कीमतें पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा रही हैं और महंगाई का दबाव सीधे आम जनता पर पड़ रहा है। शेयर बाजार में लगातार गिरावट ने निवेशकों की संपत्ति में लाखों करोड़ रुपये का नुकसान कर दिया है। इस सबकी जिम्मेदारी अगर खुलकर सामने आएगी, तो विपक्ष सरकार को घेर सकता है।

सरकार जनता और मीडिया से यही उम्मीद करती है कि वे इस मुद्दे को ‘दूर की समस्या’ मानकर न देखें। लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत सिर्फ देखता नहीं रह सकता। पश्चिम एशिया संकट सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। यदि युद्ध और फैलता है, तो तेल की कीमतें और बढ़ेंगी, महंगाई बढ़ेगी, और कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ेगा। जनता की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होगी।

सरकार की यह चुप्पी केवल राजनीतिक बहाने के पीछे छिपी हुई है। अमेरिकी व्यापार सौदों, खाड़ी देशों के निवेश और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर सरकार घबराई हुई है। संसद में बहस खुलने पर यह सारी कमजोरियां और त्रुटियां उजागर हो सकती हैं। यही कारण है कि सरकार ‘बहस से बचने’ की रणनीति अपनाए हुए है।

लेकिन विपक्ष और विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि यह रणनीति देश और अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है। यदि संसद में बहस नहीं हुई, तो नीति निर्माण में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी रहेगी। जनता को नहीं पता चलेगा कि सरकार ने तेल की कीमतों, मुद्रा अस्थिरता और निवेशकों की सुरक्षा के लिए क्या योजना बनाई है।

शासन की यह अनदेखी केवल राजनीतिक स्वार्थ पर आधारित है। युद्ध का असर केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं है, यह घरेलू बाजार, निवेशकों की संपत्ति और आम जनता की जेब तक पहुँचता है। शेयर बाजार में गिरावट, रुपया कमजोर होना और महंगाई बढ़ना—इन सब पर सरकार की चुप्पी दर्शाती है कि उसे जनता के सामने वास्तविक जवाब देने में परेशानी है।

सरकार संसद में बहस से इसलिए भाग रही है ताकि उसकी जवाबदेही कम दिखाई दे। लेकिन यह भूल रही है कि लोकतंत्र में संसद ही जनता और सरकार के बीच पुल का काम करती है। अगर संसद में खुलकर चर्चा होती, तो न केवल नीति निर्माता अपनी रणनीति स्पष्ट कर सकते थे, बल्कि निवेशकों और जनता को भी भरोसा मिलता।

इस संकट के दौरान सरकार की भागदौड़ और चुप्पी यह संकेत देती है कि उसे अपनी विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक तैयारी पर भरोसा नहीं है। वह केवल जनता और विपक्ष से बहस से बचकर अपने राजनीतिक स्वार्थ को सुरक्षित रखना चाहती है। लेकिन वास्तविक दुनिया में जनता की पेट्रोल-डीजल की कीमतें, महंगाई और शेयर बाजार की अस्थिरता ऐसे बहाने मानने वाली नहीं हैं।

यदि यह स्थिति जारी रही, तो भविष्य में जब तेल की कीमतें और बढ़ेंगी और महंगाई जनता की जेब तक पहुंचेगी, तब सरकार की यह रणनीति पूरी तरह नाकाम साबित होगी। संसद में बहस को टालना केवल समय की बर्बादी नहीं, बल्कि देश के हितों पर लगातार खतरे को आमंत्रित करना है।

इसलिए आवश्यक है कि सरकार तुरंत संसद में अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध और उसके भारत पर असर पर चर्चा की अनुमति दे। बहस का उद्देश्य आलोचना करना नहीं बल्कि नीति निर्माण को मजबूत करना, निवेशकों और जनता को भरोसा देना और संकट का सामना करने के लिए तैयार रहना होना चाहिए। लोकतंत्र में जवाबदेही को दरकिनार करना या बहस से भागना स्वीकार्य नहीं।

अंत में यही कहा जा सकता है कि सरकार संसद में इस बहस से इसलिए भाग रही है ताकि राजनीतिक संकट और सार्वजनिक सवालों से बचा जा सके। लेकिन यह असली जीवन की चुनौतियों और अर्थव्यवस्था की वास्तविकता को नहीं बदलता। जनता, निवेशक और देश की अर्थव्यवस्था इस बहस के बिना नहीं रुक सकती।

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