
बिहार की राजनीति केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा या दलगत संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उस सामाजिक संरचना का भी दर्पण है, जिसमें जाति, वर्ग और ऐतिहासिक असमानताएँ सत्ता के वितरण को लगातार प्रभावित करती रही हैं। आजादी के बाद से लेकर 2026 तक बिहार की राजनीति ने कई वैचारिक और सामाजिक मोड़ लिए-सवर्ण वर्चस्व से लेकर मंडल-उत्तर युग तक, और अब OBC-EBC आधारित प्रतिस्पर्धी राजनीति तक। लेकिन इस पूरी यात्रा में एक प्रश्न लगातार अनुत्तरित बना हुआ है-क्या बिहार की सत्ता वास्तव में उस सामाजिक न्याय को हासिल कर पाई है, जिसकी बात दशकों से की जाती रही है?
इस प्रश्न के केंद्र में आज अति पिछड़ा वर्ग (EBC) खड़ा है- जो जनसंख्या के लिहाज से सबसे बड़ा सामाजिक समूह होने के बावजूद सत्ता के शीर्ष पर सबसे कम प्रतिनिधित्व वाला वर्ग बना हुआ है।
बिहार की राजनीति का ऐतिहासिक संदर्भ: सत्ता का बदलता सामाजिक आधार
आजादी के बाद शुरुआती दशकों में बिहार की राजनीति पर स्पष्ट रूप से सवर्ण वर्गों- ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ-का वर्चस्व रहा। प्रशासनिक तंत्र, राजनीतिक नेतृत्व और नीति निर्धारण लगभग इन्हीं वर्गों के इर्द-गिर्द केंद्रित था। श्रीकृष्ण सिंह जैसे नेता ने विकास-आधारित शासन की नींव रखी, लेकिन सामाजिक प्रतिनिधित्व सीमित रहा। 1970–80 के दशक में कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं के माध्यम से पहली बार पिछड़े वर्गों की राजनीति का उभार दिखाई दिया, लेकिन यह स्थायी सत्ता संरचना में तब्दील नहीं हो सका। वास्तविक परिवर्तन 1990 के बाद आया, जब मंडल आयोग की सिफारिशों ने भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय की नई भाषा गढ़ी। इसी दौर में लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने पिछड़े वर्गों को राजनीतिक शक्ति में बदल दिया और OBC राजनीति बिहार की मुख्यधारा बन गई। लेकिन यहीं से एक नई असमानता भी जन्म लेने लगी-OBC के भीतर ही एक आंतरिक पदानुक्रम, जिसमें यादव, कुर्मी और कुशवाहा जैसे समूह सत्ता के केंद्र में आ गए, जबकि EBC लगातार हाशिये पर बना रहा।
EBC की सामाजिक संरचना: बिखराव में छिपी बड़ी ताकत
बिहार के जातीय सर्वेक्षण (2023) के अनुसार, अति पिछड़ा वर्ग राज्य की जनसंख्या का लगभग 36% है। यह संख्या किसी भी राजनीतिक समूह की तुलना में सबसे बड़ी है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी संरचना है-112 से अधिक जातियों में विभाजित यह वर्ग एकीकृत राजनीतिक पहचान नहीं बना सका। इस समूह में मल्लाह, कहार, धनुक, नाई, तेली, हज्जाम, बढ़ई जैसी अनेक जातियाँ शामिल हैं। इनके भीतर न केवल सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएँ भी हैं। यही कारण है कि EBC एक ‘वोट बैंक’ तो बन जाता है, लेकिन ‘सत्ता ब्लॉक’ नहीं बन पाता। इसके विपरीत यादव, कुर्मी और कुशवाहा जैसी जातियाँ अपेक्षाकृत संगठित सामाजिक-राजनीतिक पहचान रखती हैं, जिससे वे राजनीतिक दलों के लिए अधिक निर्णायक और स्थिर आधार बन जाती हैं।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व की वास्तविकता: संख्या बनाम सत्ता
बिहार की राजनीति में पिछले तीन दशकों का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि EBC की भूमिका मुख्यतः सहायक (supporting role) तक सीमित रही है। पंचायत स्तर पर आरक्षण, विभिन्न आयोगों का गठन और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इस वर्ग को राजनीतिक रूप से साधने का प्रयास तो हुआ, लेकिन सत्ता के शीर्ष- मुख्यमंत्री पद तक इसकी पहुंच लगभग नगण्य रही। यह एक महत्वपूर्ण विरोधाभास है-जिस वर्ग की जनसंख्या सबसे अधिक है, उसकी सत्ता में हिस्सेदारी सबसे कम क्यों है? इसका उत्तर केवल राजनीति में नहीं, बल्कि सामाजिक संगठन की प्रकृति में छिपा है। EBC के भीतर नेतृत्व का केंद्रीकरण नहीं हो पाया। हर जाति अपने स्थानीय मुद्दों में उलझी रही, जिससे एक साझा राजनीतिक एजेंडा विकसित नहीं हो सका।
सामाजिक न्याय की राजनीति और उसका सीमित विस्तार
मंडल राजनीति ने बिहार में सामाजिक न्याय की एक नई चेतना पैदा की, लेकिन समय के साथ यह चेतना सत्ता संतुलन की राजनीति में बदल गई। सामाजिक न्याय का उद्देश्य था- समान प्रतिनिधित्व और अवसर की बराबरी। लेकिन व्यवहार में यह प्रक्रिया नए शक्ति केंद्रों के निर्माण तक सीमित रह गई। लालू प्रसाद यादव का युग OBC सशक्तिकरण का प्रतीक बना, जबकि नीतीश कुमार ने EBC को प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर कुछ जगह देने का प्रयास किया-जैसे EBC आयोग, पंचायतों में आरक्षण और महादलित अवधारणा। लेकिन इन प्रयासों का प्रभाव संरचनात्मक सत्ता परिवर्तन में नहीं बदल सका। यही कारण है कि EBC आज भी ‘नीति का विषय’ तो है, लेकिन ‘सत्ता का केंद्र’ नहीं।
राजनीतिक दलों की रणनीति: प्रतिनिधित्व या वोट प्रबंधन?
बिहार की सभी प्रमुख पार्टियाँ- चाहे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) हो या महागठबंधन (RJD-केंद्रित राजनीति)-EBC को अपने चुनावी समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं। लेकिन यह भागीदारी अधिकतर ‘वोट प्रबंधन’ तक सीमित रहती है। EBC समुदायों को टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से जोड़ा जाता है, लेकिन मुख्यमंत्री या निर्णायक नेतृत्व की स्थिति में इस वर्ग का प्रतिनिधित्व दुर्लभ ही रहा है। यह पैटर्न इस बात का संकेत है कि बिहार की राजनीति अभी भी ‘सामाजिक संतुलन’ की बजाय ‘चुनावी समीकरण’ पर अधिक आधारित है।
EBC की चुनौती: नेतृत्व का संकट और संगठन की कमी
EBC की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या उसका बिखराव है। यह बिखराव केवल सामाजिक नहीं, बल्कि संगठनात्मक भी है। इस वर्ग के भीतर कोई ऐसा सर्वमान्य नेता नहीं उभर पाया है जो 112 जातियों को एक साझा राजनीतिक मंच पर ला सके। कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता इस वर्ग के ऐतिहासिक प्रतीक जरूर हैं, लेकिन उनके बाद वैसा कोई व्यापक प्रभाव वाला नेतृत्व विकसित नहीं हो सका। परिणामस्वरूप, EBC का राजनीतिक प्रभाव चुनावी परिणामों को प्रभावित तो करता है, लेकिन सत्ता की दिशा तय नहीं कर पाता।
भविष्य की राजनीति: क्या EBC सत्ता के केंद्र में आ सकता है?
यह प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन से जुड़ा है। यदि EBC को वास्तविक सत्ता हिस्सेदारी चाहिए, तो उसे तीन स्तरों पर परिवर्तन की आवश्यकता होगी
- पहला, राजनीतिक एकजुटता का निर्माण।
- दूसरा, साझा नेतृत्व का विकास।
- तीसरा, दलगत निर्भरता से बाहर निकलकर स्वतंत्र राजनीतिक चेतना का निर्माण।
जब तक ये तीन तत्व विकसित नहीं होते, तब तक EBC की भूमिका निर्णायक तो रहेगी, लेकिन शासकीय नहीं।
अधूरी यात्रा का सच
बिहार की राजनीति ने सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन यह यात्रा अभी भी अधूरी है। सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ है, लेकिन समान प्रतिनिधित्व की भावना अभी भी पूरी तरह साकार नहीं हो सकी है। EBC आज बिहार की सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति है, लेकिन राजनीतिक शक्ति के रूप में वह अभी भी संक्रमणकाल में है-एक ऐसी अवस्था में जहां उसकी संख्या उसकी ताकत तो है, लेकिन उसका संगठन उसकी कमजोरी बना हुआ है।अंततः बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न यही है- क्या सामाजिक न्याय केवल वोट बैंक का संतुलन है, या वास्तविक सत्ता साझेदारी का मार्ग? और इसका उत्तर आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति की दिशा तय करेगा।






