
दिल्ली के जंतर-मंतर पर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जिस तरह पुलिस ने अनशन स्थल से हटाया, उसने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र में विरोध के अधिकार और राज्य की शक्ति के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने इस कार्रवाई के लिए विशेष रणनीति बनाई, बड़ी संख्या में अधिकारियों की तैनाती की और बिना किसी बड़े टकराव के वांगचुक को अस्पताल पहुंचा दिया। सरकार और पुलिस इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई बता सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र में सवाल केवल इतना नहीं होता कि कार्रवाई शांतिपूर्ण थी या नहीं, बल्कि यह भी होता है कि उसकी आवश्यकता क्या थी और उसका संदेश क्या गया।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने, शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने और लोकतांत्रिक तरीके से सरकार तक अपनी मांग पहुंचाने का अधिकार देता है। यही लोकतंत्र की आत्मा है। यदि कोई व्यक्ति हिंसा नहीं कर रहा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचा रहा और शांतिपूर्ण अनशन के माध्यम से अपनी बात रख रहा है, तो सरकार का पहला दायित्व संवाद होना चाहिए, न कि उसे हटाने की रणनीति बनाना।
सोनम वांगचुक कोई अचानक उभरे हुए आंदोलनकारी नहीं हैं। वे लंबे समय से पर्यावरण, हिमालयी क्षेत्रों और लद्दाख से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। यदि उनकी मांगों से सरकार सहमत नहीं थी, तो लोकतांत्रिक तरीका बातचीत का था। लेकिन यदि प्रशासन का पूरा ध्यान आंदोलन को समाप्त करने पर केंद्रित दिखाई दे, तो यह संदेश जाता है कि सरकार असहमति से असहज है।
यदि मीडिया रिपोर्टों में वर्णित तैयारियां सही हैं- जैसे बड़ी संख्या में वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती, पूरे इलाके में सुरक्षा व्यवस्था और अत्यधिक गोपनीय योजना- तो यह भी प्रश्न उठता है कि क्या एक शांतिपूर्ण अनशन से निपटने के लिए इतनी व्यापक प्रशासनिक मशीनरी की आवश्यकता थी? क्या यही संसाधन कानून-व्यवस्था की अन्य चुनौतियों में अधिक उपयोगी नहीं हो सकते थे?
यह भी ध्यान देने योग्य है कि लोकतंत्र में सरकारें विरोध से नहीं, बल्कि संवाद से मजबूत होती हैं। विरोध करने वाले हर व्यक्ति को सरकार का विरोधी मान लेना लोकतांत्रिक सोच नहीं है। कई बार आंदोलन सरकारों को बेहतर फैसले लेने की दिशा भी दिखाते हैं। इतिहास गवाह है कि भारत में अनेक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव जन आंदोलनों और शांतिपूर्ण विरोध के बाद ही हुए हैं।
केंद्र सरकार के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि किसी धरने को कितनी जल्दी समाप्त किया जाए। असली चुनौती यह है कि जनता के मन में यह विश्वास बना रहे कि सरकार उनकी बात सुनने को तैयार है। यदि यह विश्वास कमजोर होता है, तो लोकतंत्र का संवाद भी कमजोर पड़ता है।
सरकार समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि किसी भी प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और प्रशासन को समय रहते कदम उठाने का अधिकार है। यह तर्क अपनी जगह उचित हो सकता है। लेकिन ऐसे हर कदम की कसौटी पारदर्शिता, आवश्यकता और अनुपातिकता होनी चाहिए। यदि कार्रवाई अत्यधिक गोपनीय लगे या उससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक दबाव का संदेश जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
आज देश में यह धारणा भी बनती जा रही है कि असहमति व्यक्त करने वाले लोगों पर प्रशासनिक सख्ती अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है। चाहे किसान आंदोलन हो, छात्रों के प्रदर्शन हों या सामाजिक कार्यकर्ताओं के धरने- हर मामले में सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून का इस्तेमाल नागरिक अधिकारों को सीमित करने के बजाय उनकी रक्षा के लिए हो।
लोकतंत्र की ताकत चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि आलोचना सुनने की क्षमता में होती है। एक मजबूत सरकार वह होती है जो विरोध के स्वर को दबाने के बजाय उसका जवाब तथ्यों और संवाद से दे। यदि सरकार को अपने निर्णयों पर भरोसा है, तो उसे शांतिपूर्ण आंदोलन से डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
सोनम वांगचुक को हटाने की घटना केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न का हिस्सा है कि क्या भारत में शांतिपूर्ण विरोध के लिए सार्वजनिक स्थान लगातार सीमित होते जा रहे हैं। यदि ऐसा है, तो यह केवल विपक्ष या किसी एक आंदोलन की चिंता नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की चिंता है।
सरकार को चाहिए कि वह इस पूरे घटनाक्रम पर पारदर्शी ढंग से अपनी स्थिति स्पष्ट करे, यदि चिकित्सा कारणों से हस्तक्षेप किया गया तो उसके तथ्य सार्वजनिक करे, और सबसे महत्वपूर्ण—आंदोलनकारियों से संवाद का रास्ता अपनाए। लोकतंत्र में जीत पुलिस कार्रवाई से नहीं, बल्कि विश्वास पैदा करने से मिलती है। जनता सरकार से यही अपेक्षा करती है कि वह विरोध को समस्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा माने।








