
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की इजरायली-अमेरिकी जॉइंट ऑपरेशन में मौत ने क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत की रणनीतिक परियोजनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर चाबहार पोर्ट को लेकर चिंता बढ़ गई है, जो भारत को अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण गेटवे है।
भारत का निवेश:
चाबहार पोर्ट में भारत ने अब तक कुल $120 मिलियन यानी लगभग ₹1,100 करोड़ का डायरेक्ट निवेश किया है। यह निवेश पोर्ट की टर्मिनल सुविधाओं, क्रेन और ऑपरेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने पर केंद्रित था। इसके अतिरिक्त, भारत ने अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया के कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स के लिए $250 मिलियन यानी लगभग ₹2,100 करोड़ की क्रेडिट लाइन भी उपलब्ध कराई है।
वर्तमान वित्तीय एलोकेशन:
2026-27 के यूनियन बजट में चाबहार प्रोजेक्ट के लिए कोई नया फंड नहीं दिया गया है। पिछले वर्ष के रिवाइज्ड एस्टिमेट में ₹400 करोड़ की एलोकेशन तय की गई थी, जो मौजूदा वित्तीय वर्ष में फाइनेंशियल एलोकेशन के रूप में अब उपलब्ध नहीं है।
भारत के लिए महत्व:
चाबहार पोर्ट भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए सीधे अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक पहुंच प्रदान करता है। यह पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर से भी जुड़ा है और ईरान और रूस के रास्ते भारत को यूरोप से जोड़ने में अहम भूमिका निभाता है।
खामेनेई की मौत के बाद अनिश्चितता:
ईरान में पॉलिटिकल अनिश्चितता बढ़ने के कारण चाबहार प्रोजेक्ट की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है। भारत ने 2024 में पोर्ट के लिए 10 साल का ऑपरेटिंग कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था। अब इस कॉन्ट्रैक्ट की लंबी अवधि ईरान की नई लीडरशिप और उसकी नीतियों पर निर्भर करेगी।
संयुक्त राज्य अमेरिका के सैंक्शन:
US सैंक्शन भारत की भागीदारी में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप के नए नियमों के तहत पहले जो छूट दी गई थी, वह खत्म कर दी गई है। इससे भारत को पहले ही निवेश कम करना पड़ा था। अगर जियोपॉलिटिकल तनाव बढ़ता है, तो भारत डिप्लोमेटिक टकराव से बचने के लिए सतर्क रणनीति अपनाएगा।








