Responsive Menu

Download App from

Download App

Follow us on

Donate Us

दहेज प्रथा और दिखावे के खिलाफ अब समाज को जागना होगा

[responsivevoice_button voice="Hindi Female"]
Author Image
Written by
Bureau Report

दहेज प्रथा और दिखावे के खिलाफ अब समाज को जागना होगा

दहेज प्रथा केवल एक सामाजिक कुरीति नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस सोच का परिणाम है, जहाँ विवाह जैसे पवित्र रिश्ते को कभी-कभी धन-दौलत, प्रतिष्ठा और दिखावे से जोड़ दिया जाता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम सब मिलकर इस सोच को बदलें।

Advertisement Box

शादी खुशियों का अवसर है, आर्थिक बोझ और सामाजिक प्रदर्शन की प्रतियोगिता नहीं।

आज बढ़ता हुआ दिखावा हमें धीरे-धीरे सामाजिक और आर्थिक पतन की ओर ले जा रहा है। महंगी शादियां, अनावश्यक खर्च, बड़े-बड़े आयोजन और दूसरों से आगे निकलने की होड़ ने कई सामान्य परिवारों पर ऐसा दबाव बना दिया है कि बेटी की शादी माता-पिता के लिए खुशी से ज्यादा चिंता का विषय बन जाती है।

कई परिवार वर्षों तक बेटी की शादी के लिए बचत करते हैं, कर्ज लेते हैं और अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करते हैं। हमें खुद से सवाल करना होगा—क्या हमारी बेटियों की खुशी महंगे दहेज और दिखावे में है, या उन्हें सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकार देने में?

जनप्रतिनिधियों की भी बड़ी जिम्मेदारी है

समाज के कल्याण के लिए हमारे जनप्रतिनिधियों को इस विषय पर आगे आना चाहिए। सांसद, विधायक, जिला पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान, नगर निकायों के जनप्रतिनिधि और अन्य सामाजिक प्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों में दहेज प्रथा और फिजूलखर्ची के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाएं

, वार्ड-वार्ड और मोहल्लेगांव-गांव-मोहल्ले बैठकों के माध्यम से लोगों को समझाया जाए कि

– दहेज लेना और देना सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं है।
– बेटी की शादी परिवार की क्षमता के अनुसार सादगी से होनी चाहिए।
– विवाह को दिखावे और प्रतिस्पर्धा का माध्यम न बनाया जाए।
– बेटियों को दहेज नहीं, शिक्षा, सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता दी जाए।
– समाज के सक्षम लोग सादगीपूर्ण विवाहों को प्रोत्साहित करें।
– विवाह समारोहों में अनावश्यक खर्च और दिखावे की होड़ को रोकने के लिए सामाजिक संकल्प लिए जाएं।

हमारी बिरादरियों और सामाजिक संगठनों को भी आगे आना होगा

हर समाज, हर बिरादरी और हर सामाजिक संगठन अपने स्तर पर संकल्प ले कि हम दहेज को प्रतिष्ठा का विषय नहीं बनाएंगे।

हमें ऐसे परिवारों का सम्मान करना चाहिए जो बिना दहेज, सादगी और सामाजिक मर्यादा के साथ विवाह करते हैं। जब समाज का सम्मान दहेज लेने वालों का नहीं, बल्कि दहेज का विरोध करने वालों का होगा, तभी वास्तविक बदलाव आएगा।

माता-पिता के दर्द को समझना होगा

एक बेटी के पिता के लिए बेटी की शादी जीवन का सबसे भावुक अवसर होता है। लेकिन जब समाज का दबाव यह कहने लगे कि बारात कितनी बड़ी होनी चाहिए, खाना कितना महंगा होना चाहिए, कितने लोगों को बुलाना चाहिए और कितना सामान देना चाहिए—तो खुशी धीरे-धीरे चिंता में बदल जाती है।

मैं मानता हूं कि किसी पिता की आर्थिक क्षमता उसकी बेटी की कीमत तय नहीं कर सकती।

हमारी बेटियां किसी सौदे का हिस्सा नहीं हैं। वे परिवार का सम्मान हैं, समाज की शक्ति हैं और आने वाली पीढ़ियों की आधारशिला हैं।

दिखावे की दौड़ को रोकना हम सबकी जिम्मेदारी है

आज हमें यह तय करना होगा कि हम अपने बच्चों को कैसी विरासत देना चाहते हैं—कर्ज, दिखावा और सामाजिक दबाव की या संस्कार, शिक्षा, सम्मान और समानता की?

अगर हम आज नहीं संभले तो आने वाली पीढ़ियां भी इसी दिखावे की दौड़ में फंसती रहेंगी।

इसलिए मैं समाज के प्रत्येक व्यक्ति, सभी बिरादरियों, सामाजिक संगठनों और विशेष रूप से हमारे जनप्रतिनिधियों से आत्मीय अपील करता हूं कि दहेज प्रथा और अनावश्यक दिखावे के खिलाफ जनजागरण को सामाजिक आंदोलन का रूप दें।

आइए, हम ऐसा समाज बनाएं जहां बेटी की शादी में यह नहीं पूछा जाए कि “क्या दिया?”
बल्कि यह पूछा जाए कि “बेटी को कितना पढ़ाया, कितना सक्षम बनाया और उसे कितना सम्मान दिया?”

समाज बदलेगा तो सोच बदलेगी,
सोच बदलेगी तो बेटियों का भविष्य बदलेगा।

आज का राशिफल

वोट करें

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने राहत कार्यक्रम की अगली किस्त जारी करने के लिए पाकिस्तान पर 11 नई शर्तें लगाई हैं। वैश्विक मंच पर क्या यह भारत की बड़ी जीत है?

और भी पढ़ें

WhatsApp