
नई दिल्ली। Instagram Reels और YouTube Shorts पर वीडियो स्क्रॉल करते हुए कब आधा घंटा बीत जाता है, इसका अंदाजा भी नहीं लगता। कुछ मिनट के लिए मोबाइल उठाने की आदत धीरे-धीरे लंबे स्क्रॉलिंग सेशन में बदल सकती है। अब वैज्ञानिक शोध में शॉर्ट वीडियो के ज्यादा इस्तेमाल और ध्यान, सेल्फ-कंट्रोल यानी आत्म-नियंत्रण के बीच संबंध सामने आया है। हालांकि, शोधकर्ता इसे दिमाग को स्थायी नुकसान पहुंचने का पुख्ता प्रमाण नहीं मानते।
शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर हर कुछ सेकंड में नया कंटेंट सामने आता है। तेज विजुअल, बदलते विषय और पसंद के मुताबिक मिलने वाले वीडियो यूजर का ध्यान खींचते हैं। एक वीडियो खत्म होते ही अगला वीडियो शुरू हो जाता है। ऐसे में बिना किसी तय उद्देश्य के स्क्रॉलिंग लंबे समय तक जारी रह सकती है।
2026 की स्टडी में क्या मिला?
2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने शॉर्ट वीडियो के समस्याग्रस्त इस्तेमाल और संज्ञानात्मक नियंत्रण के बीच संबंध की जांच की। इसके लिए Go/No-Go जैसे टास्क का इस्तेमाल किया गया। इस परीक्षण में प्रतिभागियों को कुछ संकेतों पर प्रतिक्रिया देनी होती है, जबकि दूसरे संकेत मिलने पर अपनी प्रतिक्रिया रोकनी होती है।
यह प्रक्रिया बताती है कि व्यक्ति गैर-जरूरी प्रतिक्रिया को रोकने और निर्देशों के मुताबिक ध्यान बनाए रखने में कितना सक्षम है। अध्ययन में शॉर्ट वीडियो की लत की प्रवृत्ति और कुछ संज्ञानात्मक संकेतों के बीच संबंध देखा गया। हालांकि, इन नतीजों से यह साबित नहीं होता कि वीडियो देखने की आदत ही कमजोर सेल्फ-कंट्रोल का कारण है।
48 लोगों पर हुई EEG स्टडी में भी सामने आया संबंध
2024 में प्रकाशित एक EEG स्टडी में 48 प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। शोधकर्ताओं ने शॉर्ट वीडियो की लत की प्रवृत्ति, सेल्फ-कंट्रोल और दिमाग की गतिविधियों का अध्ययन किया। इसमें शॉर्ट वीडियो की लत के ज्यादा स्कोर और सेल्फ-कंट्रोल से जुड़े कुछ संकेतों के बीच नकारात्मक संबंध पाया गया।
EEG तकनीक के जरिए दिमाग की विद्युत गतिविधियों को रिकॉर्ड किया जाता है। इससे शोधकर्ताओं को ध्यान और एक्जीक्यूटिव कंट्रोल जैसी प्रक्रियाओं से जुड़े संकेतों का अध्ययन करने में मदद मिलती है।
एक्जीक्यूटिव कंट्रोल दिमाग की वह क्षमता है, जो किसी काम पर ध्यान बनाए रखने, जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देने से बचने और अपने व्यवहार को लक्ष्य के मुताबिक नियंत्रित करने में मदद करती है।
हालांकि, इस अध्ययन में प्रतिभागियों की संख्या कम थी। इसलिए इसके नतीजों को सभी उम्र के लोगों पर लागू करना या यह कहना कि Reels देखने से दिमाग की क्षमता घट जाती है, सही नहीं होगा।
पसंदीदा वीडियो के चक्कर में बढ़ती है स्क्रॉलिंग
शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म यूजर की पसंद और देखने के व्यवहार के आधार पर नया कंटेंट दिखाते हैं। पसंदीदा विषयों के वीडियो लगातार मिलने से स्क्रॉलिंग रोकना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में वीडियो की कुल संख्या के साथ यह भी मायने रखता है कि कोई व्यक्ति कितनी देर और किस उद्देश्य से कंटेंट देख रहा है।
शोध में शॉर्ट वीडियो के अत्यधिक या समस्याग्रस्त इस्तेमाल और ध्यान-संबंधी क्षमताओं के बीच संबंध जरूर सामने आए हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि ज्यादा वीडियो देखने से ध्यान कमजोर होता है या जिन लोगों को पहले से ध्यान नियंत्रित करने में परेशानी होती है, वे ज्यादा स्क्रॉल करते हैं।
Reels देखने की आदत पर कैसे लगाएं लगाम?
अगर आप भी वीडियो देखते समय समय का ध्यान नहीं रख पाते, तो कुछ छोटे बदलाव मददगार हो सकते हैं। मोबाइल में ऐप की डेली टाइम लिमिट तय करें और गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद रखें। पढ़ाई, काम और सोने से पहले बिना उद्देश्य स्क्रॉल करने से बचें। वीडियो देखने के लिए एक निश्चित समय तय करना भी उपयोगी हो सकता है।







