Responsive Menu

Download App from

Download App

Follow us on

Donate Us

बोफोर्स: जिस घोटाले ने बदली देश की राजनीति, उसका कानूनी अध्याय अब खत्म

जिस घोटाले ने बदली देश की राजनीति, उसका कानूनी अध्याय अब खत्म
जिस घोटाले ने बदली देश की राजनीति, उसका कानूनी अध्याय अब खत्म
[responsivevoice_button voice="Hindi Female"]
Author Image
Written by
Rishabh Rai

करीब चार दशक तक भारतीय राजनीति, न्याय व्यवस्था और जांच एजेंसियों के लिए चर्चा का विषय रहा बोफोर्स घोटाला अब कानूनी तौर पर समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दाखिल आखिरी याचिका भी खारिज कर दी है। इसके साथ ही 1980 के दशक में देश की राजनीति को झकझोर देने वाले इस चर्चित मामले का न्यायिक अध्याय बंद हो गया। हालांकि अदालत में मामला खत्म हो गया है, लेकिन बोफोर्स आज भी भारतीय राजनीति के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बना रहेगा।

बोफोर्स घोटाले की शुरुआत 1986 में हुई, जब भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स से 155 मिमी हॉवित्जर तोपों की खरीद के लिए लगभग 1,437 करोड़ रुपये का समझौता किया। उस समय भारत अपनी सेना के आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा था और इस सौदे को रक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना गया था।

Advertisement Box

लेकिन अगले ही साल, 1987 में स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट ने इस पूरे सौदे पर सवाल खड़े कर दिए। रिपोर्ट में दावा किया गया कि बोफोर्स कंपनी ने भारत में रक्षा सौदा हासिल करने के लिए कथित तौर पर करोड़ों रुपये की रिश्वत दी। इसके बाद यह मामला तेजी से राजनीतिक विवाद में बदल गया।

उस समय प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी और उनकी सरकार विपक्ष के निशाने पर आ गई। आरोप यह भी लगे कि डील में कथित बिचौलियों की भूमिका रही और रिश्वत के पैसे प्रभावशाली लोगों तक पहुंचे। हालांकि राजीव गांधी ने लगातार इन आरोपों से इनकार किया, लेकिन इस विवाद का राजनीतिक असर काफी बड़ा रहा। 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी और बोफोर्स मुद्दा उस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया।

इसके बाद मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई। कई देशों से दस्तावेज मंगाए गए, बैंक खातों की जांच हुई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग लेने की कोशिश की गई। लेकिन वर्षों तक चली जांच के बावजूद एजेंसी अदालत में ऐसे ठोस और निर्विवाद सबूत पेश नहीं कर सकी, जिनके आधार पर आरोप साबित किए जा सकें।

साल 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ सभी आरोप समाप्त कर दिए। अदालत ने कहा कि CBI पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में विफल रही। बाद में इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी दाखिल हुईं, लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और अब यह मामला पूरी तरह समाप्त हो गया है।

यह सवाल स्वाभाविक है कि इतना बड़ा मामला आखिर अदालत में कमजोर क्यों पड़ गया। इसके पीछे कई कारण सामने आए। सबसे बड़ी वजह मजबूत और प्रत्यक्ष साक्ष्यों का अभाव था। जांच एजेंसी रिश्वत के आरोपों और कथित लाभार्थियों के बीच सीधा संबंध साबित नहीं कर सकी। जिन विदेशी दस्तावेजों पर जांच आधारित थी, उनकी प्रमाणिकता पर भी अदालत ने सवाल उठाए। कई दस्तावेज विधिवत प्रमाणित नहीं थे, जिससे उनकी कानूनी वैधता कमजोर पड़ गई।

इसके अलावा जांच और कानूनी प्रक्रिया में वर्षों की देरी ने भी मामले को प्रभावित किया। समय बीतने के साथ कई गवाह उपलब्ध नहीं रहे, कई आरोपी दुनिया छोड़ चुके थे और कई अहम परिस्थितियां बदल चुकी थीं। ऐसे में अदालत में आरोपों को साबित करना और कठिन हो गया।

CBI ने अंतिम वर्षों में भी मामले को आगे बढ़ाने की कोशिश की। एजेंसी ने अमेरिकी जांचकर्ता माइकल हर्शमैन से जुड़े दस्तावेज और जानकारी जुटाने का प्रयास किया। हर्शमैन ने दावा किया था कि बोफोर्स जांच को उस समय प्रभावित किया गया था। CBI ने अमेरिका से सहयोग लेने के लिए इंटरपोल, विदेशी एजेंसियों और अदालत के माध्यम से लेटर रोगेटरी भी भेजा, लेकिन कोई ऐसा नया साक्ष्य नहीं मिला जिससे मामले की दिशा बदल सकती।

इस लंबे मुकदमे के दौरान CBI की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे। रिपोर्टों के अनुसार जांच पर लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन उसके बावजूद एजेंसी अदालत में आरोप सिद्ध नहीं कर सकी। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी यह टिप्पणी की थी कि अपील दाखिल करने में असामान्य देरी हुई और उसका संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। इससे जांच एजेंसी की कार्यशैली पर भी बहस छिड़ी।

हालांकि बोफोर्स विवाद का एक दूसरा पक्ष भी है, जो अक्सर राजनीतिक बहस में पीछे छूट जाता है। जिस बोफोर्स तोप को लेकर वर्षों तक विवाद चला, उसी तोप ने 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के लिए निर्णायक भूमिका निभाई। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने में इसकी मारक क्षमता और सटीकता ने भारतीय सेना को महत्वपूर्ण बढ़त दिलाई। सेना के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने भी समय-समय पर बोफोर्स तोप की प्रभावशीलता की सराहना की है।

यानी एक ओर रक्षा सौदे पर भ्रष्टाचार के आरोप थे, तो दूसरी ओर वही हथियार युद्ध के मैदान में भारत की ताकत साबित हुआ। यही कारण है कि बोफोर्स मामला भारतीय इतिहास में केवल एक घोटाले के रूप में नहीं, बल्कि राजनीति, रक्षा नीति और न्यायिक प्रक्रिया के जटिल संबंधों के उदाहरण के रूप में भी याद किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब इस मामले का कानूनी अध्याय समाप्त हो चुका है। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और परिस्थितियों के आधार पर आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं मानी। इसका मतलब यह नहीं है कि इतिहास के सभी सवालों के जवाब मिल गए हैं, बल्कि इतना जरूर है कि कानून की नजर में यह मामला अब बंद हो चुका है।

बोफोर्स घोटाला भारतीय लोकतंत्र को यह भी याद दिलाता है कि बड़े और संवेदनशील मामलों में समय पर जांच, मजबूत साक्ष्य और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण होती है। यदि जांच में देरी हो, साक्ष्य कमजोर हों या प्रक्रियात्मक कमियां रह जाएं, तो वर्षों तक चले मुकदमे भी अदालत में टिक नहीं पाते।

करीब 40 साल बाद बोफोर्स केस का पटाक्षेप हो गया है, लेकिन यह मामला भारतीय राजनीति और न्याय व्यवस्था के इतिहास में हमेशा एक ऐसे प्रकरण के रूप में याद किया जाएगा, जिसने सत्ता, भ्रष्टाचार, जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया पर सबसे लंबी बहसों में से एक को जन्म दिया।

आज का राशिफल

वोट करें

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने राहत कार्यक्रम की अगली किस्त जारी करने के लिए पाकिस्तान पर 11 नई शर्तें लगाई हैं। वैश्विक मंच पर क्या यह भारत की बड़ी जीत है?

और भी पढ़ें

WhatsApp