
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। समाजवादी पार्टी (सपा) के पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण की काट तलाशने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विकास, सुशासन और मजबूत कानून-व्यवस्था को अपने चुनावी विमर्श का प्रमुख आधार बनाने की तैयारी में है। पार्टी की रणनीति प्रदेश की जनता के सामने 2017 से पहले और उसके बाद के उत्तर प्रदेश की तुलना पेश करने की है।
पार्टी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में अपने प्रचार अभियान के दौरान पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल और मौजूदा सरकार की उपलब्धियों को प्रमुखता से उठाएगी। इसके तहत 2017 से पहले प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति, माफियाओं के प्रभाव, जमीनों पर अवैध कब्जे और अपराध से जुड़े मुद्दों को चुनावी बहस का हिस्सा बनाया जा सकता है। वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र कर तत्कालीन सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाने की भी तैयारी है।
इसके अलावा 1995 के चर्चित गेस्ट हाउस कांड को भी राजनीतिक विमर्श में शामिल किया जा सकता है। भाजपा इसके जरिए समाजवादी पार्टी के सुशासन और सामाजिक न्याय से जुड़े दावों पर सवाल खड़े करने की रणनीति बना रही है। पार्टी का प्रयास होगा कि मतदाताओं के सामने पिछली सरकारों के कार्यकाल और वर्तमान शासन के बीच अंतर को स्पष्ट रूप से रखा जाए।
दूसरी ओर, भाजपा अपनी सरकार की उपलब्धियों को भी बड़े स्तर पर जनता के बीच पहुंचाने की तैयारी में है। एक्सप्रेसवे का विस्तार, नए एयरपोर्ट, औद्योगिक निवेश, बुनियादी ढांचे का विकास, रोजगार के अवसर, किसान कल्याण योजनाएं और गन्ना किसानों के भुगतान जैसे मुद्दे चुनावी प्रचार का अहम हिस्सा हो सकते हैं। पार्टी इन उपलब्धियों के जरिए विकास और सुशासन के अपने दावे को मजबूत करना चाहती है।
भाजपा की रणनीति केवल बड़े मुद्दों तक सीमित नहीं रहने वाली है। चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध, पूर्वांचल और बुंदेलखंड समेत प्रदेश के सभी क्षेत्रों में बड़ी क्षेत्रीय रैलियां आयोजित करने की योजना पर भी काम किया जा रहा है। इन रैलियों के माध्यम से सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को स्थानीय मुद्दों से जोड़कर जनता तक पहुंचाने का प्रयास होगा।
संगठनात्मक स्तर पर भी पार्टी अपनी तैयारियों को धार देने में जुटी है। बूथ समितियों को सक्रिय करने, पन्ना प्रमुखों के नेटवर्क को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर मौजूद गुटबाजी और आपसी मतभेदों को दूर करना भी संगठन की प्राथमिकताओं में शामिल है।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में 2027 का चुनाव भाजपा और सपा के बीच अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा भी होगा। सपा जहां पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट करने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा विकास, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की तैयारी में है।








