
नई दिल्ली। मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित असहमति ने राजनीतिक विवाद को और गहरा कर दिया है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और आदेशों को लेकर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें एक ही दिन में चार बार आपत्ति दर्ज किए जाने का मामला भी शामिल है। दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर कई फैसलों के उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए।
SIR की प्रक्रिया जून 2025 में बिहार से शुरू हुई थी और बाद में इसे देश के अन्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तार दिया गया। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त तथा सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त के तौर पर सूचीबद्ध हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां केवल किसी एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं थीं। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, SIR प्रक्रिया के दौरान दायर अपीलों तथा मतदाता सूची से जुड़े आईटी सिस्टम और उसके नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल थे। इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजे जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
नए मतदाताओं के फॉर्म पर सवाल
मामले का एक प्रमुख हिस्सा नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में बदलाव से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 में फॉर्म में SIR से संबंधित एक नया सवाल जोड़ा गया था। इसमें आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई और इसे लेकर सरकार के स्तर पर प्रक्रिया अपनाने की जरूरत बताई।
इस मुद्दे पर सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि Form-6 नए मतदाताओं के पंजीकरण की बुनियादी प्रक्रिया का हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने आशंका जताई कि इस तरह की अतिरिक्त जानकारी मांगने से पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के लिए प्रक्रिया कठिन हो सकती है।
मतदाता सूची के आईटी सिस्टम पर भी सवाल
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम के नियंत्रण से जुड़ा बताया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने मतदाता सूची से जुड़े आईटी सिस्टम में अधिकारों के केंद्रीकरण पर सवाल उठाए। दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर यह चिंता जताई कि स्थानीय स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों की भूमिका और उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
रिपोर्ट में गोवा का उदाहरण भी दिया गया है, जहां 97 मतदाताओं को स्थानीय स्तर पर संबंधित अधिकारियों ने पात्र माना था, लेकिन सॉफ्टवेयर में उनकी स्थिति दर्ज करने की तकनीकी व्यवस्था उपलब्ध नहीं होने के कारण वे अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके। इस मामले को भी आयोग के भीतर उठाई गई चिंताओं से जोड़ा गया है।
पश्चिम बंगाल में अपीलों को लेकर सवाल
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों में दायर अपीलों को लेकर भी सवाल उठाए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने अगस्त में आयोग के अधिकारियों से पूछा कि उन मतदाताओं के खिलाफ अपील दायर करने की अनुमति किसने दी, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने सूची में शामिल करने का फैसला किया था। उन्होंने यह भी पूछा कि ये अपीलें वास्तव में किसने दायर कीं। रिपोर्ट के अनुसार, संधू ने कहा कि उन्हें, जोशी और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इस प्रक्रिया के आधार के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
इस खुलासे के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि यदि रिपोर्ट में सामने आई बातें सही हैं तो आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर प्रश्न पैदा होते हैं। कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच हुए पत्राचार को सार्वजनिक करने की मांग की है।
शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर कड़ी टिप्पणी की। विपक्षी नेताओं ने संसद में इस मुद्दे को उठाने की बात भी कही है।
वहीं, रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले द इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग से इन आपत्तियों और उन्हें दूर करने के लिए उठाए गए कदमों पर सवाल भेजे थे। रिपोर्ट के अनुसार, आयोग की ओर से इन सवालों का जवाब नहीं मिला।
कानूनी व्यवस्था में आयोग की सामूहिक भूमिका
चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी बहस तेज हुई है। 2023 के संबंधित कानून की धारा 18 के अनुसार आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना है और यदि सदस्यों में मतभेद हो तो बहुमत की राय के आधार पर निर्णय लिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने आयोग के अधिकारियों को इन प्रावधानों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि आयोग के नाम से जारी होने वाले संचार के लिए आवश्यक मंजूरी होनी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने SIR की प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था और पारदर्शिता को लेकर भी बहस खड़ी कर दी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आयोग इन आपत्तियों और उनसे जुड़े दस्तावेजों पर सार्वजनिक रूप से क्या स्पष्टीकरण देता है।






