
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एक पुराना मुद्दा फिर जोर पकड़ रहा है—क्या देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य कभी चार अलग-अलग राज्यों में बंटेगा? देवरिया के सोनूघाट स्थित जनता इंटर कॉलेज में 20 सितंबर को आयोजित सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की ‘सामाजिक समरसता महारैली’ में यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री और सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने इस सवाल को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया।
राजभर ने दावा किया कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में बंटेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर पूर्वांचल अलग राज्य बनता है तो वहां पहला मुख्यमंत्री राजभर समाज से होगा। साथ ही उन्होंने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की मांग दोहराई। राजभर ने जातिगत जनगणना के बाद इस मुद्दे पर आगे बढ़ने की बात कही और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत तथा आश्वासन का भी दावा किया है।
लेकिन बड़ा सवाल यही है—क्या यह सिर्फ चुनावी मंच से निकला राजनीतिक बयान है या वास्तव में उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की कोई ठोस प्रक्रिया शुरू हो सकती है?
राजभर ने आखिर कहा क्या?
देवरिया की रैली में राजभर ने अपने समर्थकों के सामने भविष्य में उत्तर प्रदेश के चार हिस्सों में बंटने की बात कही। उनका फोकस खास तौर पर पूर्वांचल पर रहा। उन्होंने कहा कि यदि पूर्वांचल अलग राज्य बनता है तो उस राज्य की पहली मुख्यमंत्री की कुर्सी पर राजभर समाज का व्यक्ति बैठेगा।
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजभर लंबे समय से पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की मांग उठाते रहे हैं। इस बार उन्होंने इस मांग को सिर्फ क्षेत्रीय विकास के सवाल से जोड़कर नहीं रखा, बल्कि इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी से भी जोड़ दिया।
राजभर का संदेश मूल रूप से यह है कि अगर पूर्वांचल अलग राज्य बनता है तो वहां के सामाजिक समीकरणों के आधार पर राजभर समाज को सत्ता में नेतृत्व की भूमिका मिलनी चाहिए।
यानी इस बयान में अलग राज्य की मांग और राजभर समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी, दोनों मुद्दे एक साथ दिखाई देते हैं।
क्या चार हिस्सों में बंटने का मतलब चार नए राज्य होंगे?
राजभर के बयान में उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की बात है। अलग राज्य की पुरानी चर्चाओं में सामान्य तौर पर पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिम प्रदेश और अवध प्रदेश जैसे क्षेत्रों की बात होती रही है। हालांकि, अलग-अलग समय पर इन क्षेत्रों के नाम और सीमाओं को लेकर अलग-अलग प्रस्ताव सामने आते रहे हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—किसी राजनीतिक नेता के बयान से अपने आप कोई नया राज्य नहीं बन जाता।
भारत के संविधान के तहत किसी राज्य की सीमाओं, क्षेत्र या नाम में बदलाव का अंतिम अधिकार संसद के पास है। ऐसे बदलाव के लिए संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना होता है। इसलिए राजभर का बयान फिलहाल राजनीतिक मांग और दावा है, इसे राज्य विभाजन का सरकारी फैसला नहीं माना जा सकता।
2011 में मायावती सरकार भी ला चुकी है प्रस्ताव
उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का मुद्दा नया नहीं है। नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने विधानसभा में उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन का प्रस्ताव पारित कराया था।
इस प्रस्ताव में उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिम प्रदेश और अवध प्रदेश में बांटने की बात कही गई थी। बाद में प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया, लेकिन यह राज्य गठन में तब्दील नहीं हो सका।
यानी उत्तर प्रदेश के विभाजन का मुद्दा करीब डेढ़ दशक से राजनीतिक बहस का हिस्सा है। समय-समय पर अलग-अलग नेता और संगठन छोटे राज्यों को विकास और प्रशासनिक सुविधा से जोड़कर इसकी मांग करते रहे हैं।
यही वजह है कि राजभर का ताजा बयान सामने आते ही 2011 की बहस भी फिर चर्चा में आ गई है।
2027 चुनाव से पहले ही क्यों उठा मुद्दा?
राजभर का यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश 2027 विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में इस बयान का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है।
पूर्वांचल उत्तर प्रदेश का बड़ा और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां बड़ी संख्या में विधानसभा सीटें हैं और अलग-अलग चुनावों में जातीय, क्षेत्रीय और स्थानीय समीकरणों ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया है।
राजभर की पार्टी का मुख्य सामाजिक आधार पूर्वांचल के राजभर समुदाय के बीच माना जाता है। ऐसे में अलग पूर्वांचल राज्य की मांग उनके लिए केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी है।
जब राजभर कहते हैं कि अलग पूर्वांचल बनने पर राजभर समाज का बेटा मुख्यमंत्री बनेगा, तो वह अपने समर्थकों के सामने सत्ता में सीधी हिस्सेदारी का राजनीतिक संदेश भी रख रहे हैं।
यह बयान उनके समर्थकों को संगठित करने और आने वाले चुनाव में सामाजिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को प्रमुख बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, इसका अंतिम राजनीतिक असर चुनावी परिणाम और मतदाताओं की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।
पूर्वांचल अलग हुआ तो क्या बदलेगा?
अगर कभी पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो सबसे बड़ा बदलाव प्रशासनिक ढांचे में होगा।
एक नया राज्य बनेगा तो अलग विधानसभा, अलग मंत्रिपरिषद, अलग प्रशासनिक ढांचा और राज्य स्तर पर नई संस्थागत व्यवस्था तैयार करनी होगी। राजधानी कहां होगी, सीमाएं क्या होंगी, परिसंपत्तियों का बंटवारा कैसे होगा, कर्मचारियों का विभाजन कैसे होगा और राजस्व तथा संसाधनों का वितरण किस तरह होगा—इन तमाम सवालों का समाधान करना पड़ेगा।
सिर्फ राजनीतिक इच्छा से राज्य का गठन नहीं हो सकता। इसके लिए लंबी प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया जरूरी होगी।
इसलिए 2027 विधानसभा चुनाव से पहले केवल बयान के आधार पर यह मान लेना कि उत्तर प्रदेश निश्चित रूप से चार राज्यों में बंट जाएगा, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
चार राज्यों की बात में सबसे बड़ा सवाल—सीमा कहां होगी?
अगर उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बांटने की बात होती है तो सबसे पेचीदा सवाल होगा कि इन राज्यों की सीमाएं क्या होंगी।
पूर्वांचल में कौन-कौन से जिले शामिल होंगे? बुंदेलखंड की सीमा कहां तक होगी? पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित राज्य में कौन से जिले जाएंगे? अवध की सीमा क्या होगी?
इन सवालों का जवाब केवल राजनीतिक भाषण से नहीं दिया जा सकता।
इसके अलावा प्रत्येक क्षेत्र की अपनी आर्थिक और सामाजिक संरचना है। कुछ जिले एक से अधिक क्षेत्रीय पहचान से जुड़े माने जाते हैं। ऐसे में नए राज्यों की सीमा तय करना अपने आप में बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी।
क्या अलग राज्य बनने से जातीय समीकरण भी बदल जाएंगे?
राजनीतिक रूप से यह सबसे ज्यादा चर्चा वाला पहलू है।
मौजूदा उत्तर प्रदेश में एक ही विधानसभा और सरकार के भीतर अलग-अलग क्षेत्रों के सामाजिक समीकरण एक-दूसरे से जुड़े हैं। अगर राज्य छोटे हिस्सों में बंटते हैं तो क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक समीकरणों का महत्व बढ़ सकता है।
पूर्वांचल में राजभर, यादव, दलित, मुस्लिम, ब्राह्मण और अन्य पिछड़ी जातियों की राजनीतिक भूमिका पर चर्चा होती रही है। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट, मुस्लिम, दलित और अन्य समुदायों के समीकरण चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण रहे हैं।
बुंदेलखंड में अलग सामाजिक संरचना है, जबकि अवध में कुर्मी, यादव, दलित, मुस्लिम और अन्य समुदायों की राजनीतिक भूमिका अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई देती है।
लेकिन यहां सावधानी जरूरी है। किसी राज्य में किसी एक समुदाय की आबादी अधिक होना अपने आप यह तय नहीं करता कि उसी समुदाय का मुख्यमंत्री या सबसे बड़ा राजनीतिक नेतृत्व होगा। चुनावी राजनीति में गठबंधन, उम्मीदवार, क्षेत्रीय मुद्दे, संगठन और मतदान व्यवहार जैसे कई कारक भूमिका निभाते हैं।
इसलिए यह कहना कि अलग राज्य बनने के बाद किसी एक जाति का ही ‘राज’ होगा, राजनीतिक अनुमान होगा, कोई निश्चित तथ्य नहीं।





