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एर्दोगन के कश्मीर राग पर भारत का कड़ा जवाब, तुर्किए को दी नसीहत

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Written by
Rishabh Rai

नई दिल्ली। तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन कई मौकों पर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मंच से कश्मीर का मुद्दा उठा चुके हैं। उनके बयानों पर भारत लगातार आपत्ति दर्ज कराता रहा है। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दे देश के आंतरिक मामले हैं और किसी तीसरे देश को इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

कश्मीर को लेकर एर्दोगन की टिप्पणियां खास तौर पर 2019 के बाद चर्चा में रहीं। सितंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 74वें सत्र को संबोधित करते हुए एर्दोगन ने कश्मीर की स्थिति पर चिंता जताई थी। उस समय भारत सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे से जुड़े अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को समाप्त किए जाने के कुछ ही सप्ताह हुए थे।

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अपने भाषण में एर्दोगन ने कश्मीर में रह रहे लोगों की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पिछले कई दशकों से इस विवाद पर पर्याप्त ध्यान देने में नाकाम रहा है। भारत ने उनके इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई और दोहराया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।

भारत ने क्या कहा था?

भारत की ओर से लगातार यह रुख सामने आया है कि दूसरे देशों को भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए। नई दिल्ली ने तुर्किए के कश्मीर संबंधी बयानों को भारत के आंतरिक मामलों में टिप्पणी के तौर पर देखा है।

भारत और तुर्किए के बीच कूटनीतिक संबंध पुराने हैं और दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश तथा अन्य क्षेत्रों में सहयोग भी रहा है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक, दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुलाकातें और बातचीत होती रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एर्दोगन की मुलाकातें भी G20 और SCO जैसे मंचों पर हुई हैं।

हालांकि, कश्मीर का मुद्दा दोनों देशों के संबंधों में एक संवेदनशील विषय बना हुआ है। जब भी एर्दोगन ने अंतरराष्ट्रीय मंच से कश्मीर का उल्लेख किया, भारत ने इसका विरोध किया और कहा कि ऐसे मुद्दों को द्विपक्षीय स्तर पर ही उठाया जाना चाहिए।

2019 का बयान क्यों रहा अहम?

2019 में एर्दोगन का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि यह अनुच्छेद 370 में बदलाव के तुरंत बाद आया था। भारत सरकार ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे से जुड़े प्रावधानों को समाप्त किया था। इसके बाद पाकिस्तान सहित कुछ देशों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाने की कोशिश की।

भारत ने लगातार यह स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े फैसले भारत के संवैधानिक ढांचे के तहत लिए गए हैं। इसी नीति के तहत नई दिल्ली ने तुर्किए की ओर से कश्मीर पर की जाने वाली टिप्पणियों का भी विरोध किया।

रिश्तों पर भी पड़ा असर

कश्मीर को लेकर तुर्किए के रुख का असर दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों पर भी दिखाई दिया है। हालांकि, भारत-तुर्किए संबंध केवल कश्मीर के मुद्दे तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक संबंधों के साथ-साथ बहुपक्षीय मंचों पर संवाद भी जारी रहा है।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत और तुर्किए के बीच उच्चस्तरीय संपर्क समय-समय पर होते रहे हैं। 2019 में भी प्रधानमंत्री मोदी और एर्दोगन के बीच G20 के दौरान मुलाकात हुई थी और दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच UNGA के दौरान बातचीत हुई थी।

ऐसे में एर्दोगन की ओर से कश्मीर का मुद्दा उठाना भारत-तुर्किए संबंधों के लिए एक संवेदनशील कूटनीतिक विषय बना हुआ है। भारत का आधिकारिक रुख लगातार यही रहा है कि कश्मीर से जुड़े मामलों पर किसी तीसरे देश की मध्यस्थता या टिप्पणी स्वीकार्य नहीं है और दोनों देशों के बीच मतभेदों के बावजूद द्विपक्षीय संवाद के रास्ते खुले रहने चाहिए।

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