
पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम में सरस्वती-सिंधु सभ्यता और भारतीय ज्ञान परंपरा पर व्याख्यान
छठवें दिन 150 से अधिक प्रतिभागियों ने लिया व्याख्यान एवं प्रायोगिक प्रदर्शन का लाभ
लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ द्वारा आयोजित ‘पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम-2026’ के छठवें दिन सरस्वती-सिंधु सभ्यता और प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर महत्वपूर्ण व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. नरेंद्र परमार, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा तथा उपनिदेशक, संग्रहालय एवं पुरातत्व विभाग, चंडीगढ़ ने ‘सरस्वती-सिंधु सभ्यता : भारतीय ज्ञान परंपरा के नए आयाम’ और ‘प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा’ विषय पर प्रतिभागियों को विस्तार से जानकारी दी।
व्याख्यान के दौरान डॉ. परमार ने विषय से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों और प्राचीन ज्ञान-पद्धतियों का प्रायोगिक प्रदर्शन भी किया। इससे प्रतिभागियों को पुरातात्त्विक साक्ष्यों और प्राचीन तकनीकी ज्ञान को व्यावहारिक एवं सरल तरीके से समझने का अवसर मिला।
पुरातत्व विभाग की निदेशक रेनू द्विवेदी ने बताया कि डॉ. परमार ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा के विकासक्रम को पुरातात्त्विक साक्ष्यों के माध्यम से समझाया। उन्होंने सरस्वती-सिंधु सभ्यता को प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण आधार के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारतीय समाज में विकसित ज्ञान केवल सैद्धांतिक नहीं था, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण, तकनीक, उत्पादन, कृषि और सामाजिक जीवन के व्यावहारिक अनुभवों से भी गहराई से जुड़ा था।
धोलावीरा की जल प्रबंधन व्यवस्था का उल्लेख
व्याख्यान में सरस्वती-सिंधु सभ्यता के पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर नगरीय नियोजन, वास्तुकला, जल एवं पर्यावरण प्रबंधन, मापन एवं गणितीय ज्ञान, कृषि, शिल्प, प्रौद्योगिकी, धातुकर्म तथा सामुद्रिक और दूरवर्ती व्यापार जैसे विषयों पर प्रकाश डाला गया।
विशेष रूप से धोलावीरा की जल-संग्रह एवं जल-प्रबंधन प्रणाली, सुव्यवस्थित नगरीय योजना, विकसित जल निकासी व्यवस्था और मानकीकृत बाट-माप का उल्लेख करते हुए इन्हें उस काल की वैज्ञानिक समझ, तकनीकी दक्षता और पर्यावरण के अनुरूप जीवन-पद्धति का महत्वपूर्ण प्रमाण बताया गया।
प्रायोगिक प्रदर्शन रहा आकर्षण का केंद्र
डॉ. परमार ने प्रारंभिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों से संबंधित विभिन्न अवधारणाओं और पुरातात्त्विक साक्ष्यों का प्रायोगिक प्रदर्शन भी किया। इसके माध्यम से प्रतिभागियों ने प्राचीन ज्ञान, तकनीकी कौशल और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के बीच संबंधों को प्रत्यक्ष रूप से समझा। प्रदर्शन को प्रतिभागियों ने रोचक, संवादात्मक और ज्ञानवर्धक बताया।
इस अवसर पर निदेशक रेनू द्विवेदी ने मुख्य वक्ता डॉ. नरेंद्र परमार का पौधा एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा और सरस्वती-सिंधु सभ्यता का अध्ययन भारत की वैज्ञानिक, तकनीकी और पर्यावरणीय दृष्टि के ऐतिहासिक विकास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि डॉ. परमार के शोधपरक व्याख्यान और प्रायोगिक प्रदर्शन से प्रतिभागियों को भारतीय ज्ञान परंपरा और पुरातात्त्विक विरासत के विविध आयामों को समग्र एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझने का अवसर मिला।
कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑफलाइन तथा 50 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की। कार्यक्रम के अंत में श्री राम विनय ने मुख्य वक्ता, निदेशक, अतिथियों, प्रतिभागियों और आयोजन में सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनोज कुमार यादव ने किया।









