
केंद्र सरकार के प्रस्तावित परिसीमन बिल को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक दलों के बीच मतभेद और बदलते गठबंधन समीकरणों के बीच यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील होता जा रहा है। चर्चा यह है कि एनडीए सरकार लोकसभा और राज्यसभा में अपने संख्याबल को मजबूत कर इस बिल को दोबारा संसद में पेश करने की तैयारी में है।
इसी बीच आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के बयान ने इस बहस को और हवा दे दी है। एक इंटरव्यू में उन्होंने संकेत दिया कि केंद्र सरकार संशोधित परिसीमन प्रस्ताव को महिला आरक्षण कानून के साथ मिलाकर संसद में फिर से ला सकती है। नायडू ने कहा कि सरकार की मंशा शुरुआत से ही स्पष्ट रही है कि सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ाई जाए, हालांकि ड्राफ्ट में कुछ बिंदु स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किए गए, जिससे भ्रम की स्थिति बनी।
उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति में महिलाओं को आरक्षण देना समय की जरूरत है और वे इसका पूरी तरह समर्थन करते हैं। नायडू की पार्टी तेलुगु देशम पार्टी (TDP) एनडीए का हिस्सा है और केंद्र में सरकार को समर्थन दे रही है, जिससे उनके बयान को राजनीतिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सरकार द्वारा अप्रैल में लाए गए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 के तहत लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर करीब 850 करने का प्रस्ताव था। साथ ही परिसीमन को 2011 की जनगणना से जोड़ने की योजना भी रखी गई थी। हालांकि यह विधेयक संसद में पास नहीं हो सका और सरकार को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। वोटिंग में सरकार के पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े, जिससे बिल 54 वोटों से गिर गया।
अब चर्चा है कि संशोधित प्रस्ताव में सभी राज्यों की सीटों में समान अनुपात में 50 प्रतिशत तक वृद्धि की जा सकती है। इसके साथ ही महिला आरक्षण को भी इसी नए ढांचे में लागू करने पर विचार चल रहा है। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो लोकसभा की कुल सीटें 850 के करीब पहुंच सकती हैं।
इस पूरे मुद्दे पर विपक्ष भी लगातार हमलावर है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उदाहरण देते हुए कहा कि भले ही सभी राज्यों में समान प्रतिशत से सीटें बढ़ाई जाएं, लेकिन वास्तविक फायदा अधिक आबादी वाले राज्यों को ही मिलेगा। उन्होंने इसे आय के उदाहरण से समझाते हुए कहा कि समान प्रतिशत वृद्धि के बावजूद अंतर और बढ़ सकता है, ठीक उसी तरह जैसे सीटों के मामले में भी बड़े और छोटे राज्यों के बीच खाई बढ़ने की आशंका है।
परिसीमन बिल अब केवल तकनीकी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह संघीय ढांचे, क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक शक्ति संतुलन का बड़ा सवाल बन गया है। आने वाले दिनों में संसद और राज्यों में इस पर सियासी घमासान और तेज होने की संभावना है।








