
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। लेकिन इस बार मामला केवल पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने या दोबारा परीक्षा कराने तक सीमित नहीं है। यह उन सपनों का सवाल बन गया है, जो लाखों छात्र-छात्राएं डॉक्टर बनने की उम्मीद के साथ देखते हैं। तमिलनाडु के कोयंबटूर में 19 वर्षीय छात्रा अनुकीर्तना की आत्महत्या और अहमदाबाद में 17 वर्षीय NEET अभ्यर्थी की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है।
अनुकीर्तना डॉक्टर बनकर गरीबों की सेवा करना चाहती थी। उसने NEET परीक्षा दी थी और मेडिकल कॉलेज में दाखिले का इंतजार कर रही थी। लेकिन पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा की घोषणा ने उसे मानसिक रूप से तोड़ दिया। मौत से पहले उसने अपने रिश्तेदारों को भेजे वॉट्सएप संदेश में लिखा कि उसे री-एग्जाम देने से डर लग रहा है और वह अपने पिता का सामना नहीं कर पाएगी, जिन्होंने उसकी पढ़ाई पर काफी पैसा खर्च किया था।
इधर अहमदाबाद में भी NEET की तैयारी कर रहे 17 वर्षीय छात्र ने छठी मंजिल से कूदकर जान दे दी। पिछले दो दिनों में यह चौथा मामला है, जबकि परीक्षा रद्द होने के बाद अब तक करीब 12 छात्रों की आत्महत्या की खबरें सामने आ चुकी हैं।
यह घटनाएं केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं, बल्कि उस परीक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल हैं, जिसमें लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा होता है। एक परीक्षा रद्द होने का असर केवल शैक्षणिक कैलेंडर पर नहीं पड़ता, बल्कि छात्रों के आत्मविश्वास, मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक संबंधों पर भी पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव को कम करने के लिए मजबूत काउंसलिंग व्यवस्था, मनोवैज्ञानिक सहायता और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। बच्चों को यह समझाने की आवश्यकता है कि एक परीक्षा जीवन का अंतिम सच नहीं होती।
आज जरूरत केवल दोषियों को सजा देने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है, जिसमें किसी छात्र को यह महसूस न हो कि असफलता या अनिश्चितता के बाद उसके पास जीवन से हार मान लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। अनुकीर्तना और अन्य छात्रों की मौत एक चेतावनी है कि अगर व्यवस्था नहीं बदली गई, तो ऐसे सपने यूं ही टूटते रहेंगे।








