Responsive Menu

Download App from

Download App

Follow us on

Donate Us

संपादकीय: ग्रेट निकोबार-विकास, रक्षा और प्रकृति के बीच संतुलन की परीक्षा

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
[responsivevoice_button voice="Hindi Female"]
Author Image
Written by
Rishabh Rai

जब कोई सरकार किसी जंगल को काटने का निर्णय लेती है, तो वह केवल पेड़ों को नहीं गिराती, बल्कि एक पूरी पारिस्थितिकी को हिला देती है। वह उन पक्षियों के घोंसलों को तोड़ती है जो वर्षों से उन्हीं शाखाओं पर लौटते रहे हैं। वह उन जीवों के घर उजाड़ती है जिनके पास अपनी बात कहने के लिए न संसद है, न अदालत। और वह उन आदिवासी समुदायों की जमीन पर प्रश्नचिह्न लगाती है, जिनकी पहचान ही उस मिट्टी, उस समुद्र और उस जंगल से बनी है।

इसी बहस के केंद्र में आज ग्रेट निकोबार खड़ा है- भारत की वह जैविक विरासत, जहाँ सदियों पुराने वर्षावन हैं, दुर्लभ वन्यजीव हैं, और दुनिया की सबसे समृद्ध प्रवाल भित्तियों में से कुछ स्थित हैं। यह केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि एक जीवित प्रयोगशाला है, जहाँ प्रकृति ने अपने सबसे नाजुक और जटिल संतुलन को वर्षों से संभालकर रखा है।

Advertisement Box

सरकार की ओर से यह तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक उपस्थिति और नौसैनिक ढांचे के विस्तार के लिए इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएँ आवश्यक हैं। यह भी कहा जाता है कि वैश्विक शक्ति-संतुलन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीति में भारत की मजबूत उपस्थिति के लिए ऐसे कदम अनिवार्य हैं। इन तर्कों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। कोई भी राष्ट्र अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकता।

लेकिन सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि विकास किस कीमत पर और किसकी कीमत पर किया जा रहा है। जब रक्षा के नाम पर जंगल काटे जाएँ, पर्यावरणीय चिंताओं को किनारे कर दिया जाए और स्थानीय समुदायों की आवाज़ को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा जाए, तो यह केवल नीति नहीं रहती- यह नैतिक प्रश्न बन जाता है।

ग्रेट निकोबार की पारिस्थितिकी बेहद संवेदनशील है। यहाँ के वर्षावन कार्बन अवशोषण के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। प्रवाल भित्तियाँ समुद्री जीवन की रीढ़ हैं। इनका नष्ट होना केवल स्थानीय नुकसान नहीं होगा, बल्कि वैश्विक जलवायु संतुलन पर भी असर डालेगा। आज जब पूरी दुनिया जलवायु संकट, समुद्र स्तर में वृद्धि और चरम मौसम की घटनाओं से जूझ रही है, तब ऐसे क्षेत्रों का संरक्षण और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

यह भी समझना जरूरी है कि विकास के विकल्प हमेशा मौजूद होते हैं, लेकिन प्रकृति के विकल्प नहीं होते। एक बंदरगाह किसी अन्य स्थान पर बन सकता है। एक होटल या औद्योगिक ढांचा किसी अन्य क्षेत्र में स्थानांतरित किया जा सकता है। लेकिन सदियों पुराना वर्षावन, प्रवाल भित्तियों का तंत्र और स्थानीय जैव विविधता एक बार टूट जाए तो उसे पुनः बनाना मानव क्षमता से परे है।

इस बहस का एक और महत्वपूर्ण पहलू है- स्थानीय समुदाय। ग्रेट निकोबार और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों की जीवनशैली, संस्कृति और आजीविका सीधे इस पर्यावरण से जुड़ी हुई है। उनके लिए जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि यह आधार ही हटा दिया जाए, तो उनका अस्तित्व केवल विस्थापन की कहानी बनकर रह जाएगा।

आज विकास की परिभाषा भी बदल रही है। अब वह समय नहीं रहा जब केवल सड़कों, इमारतों और बंदरगाहों को विकास माना जाता था। अब दुनिया ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ की बात करती है- ऐसा विकास जो प्रकृति और मानव के बीच संतुलन बनाए रखे। भारत जैसे देश के लिए, जो जैव विविधता में अत्यंत समृद्ध है, यह और भी जरूरी हो जाता है कि विकास मॉडल सोच-समझकर चुना जाए।

यह भी ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आधुनिक दुनिया में दोनों को साथ लेकर चलने की क्षमता तकनीक, योजना और दूरदृष्टि पर निर्भर करती है। अगर इरादा मजबूत हो तो ऐसे मॉडल विकसित किए जा सकते हैं जिनमें रणनीतिक जरूरतें भी पूरी हों और पारिस्थितिकी को भी नुकसान न पहुँचे।

समस्या तब पैदा होती है जब निर्णय प्रक्रिया में पर्यावरण को ‘बाधा’ माना जाता है, न कि ‘संपत्ति’। जबकि सच्चाई यह है कि पर्यावरण ही वह सुरक्षा कवच है जो दीर्घकाल में राष्ट्र को स्थिरता और मजबूती देता है।

आज यह आवश्यक है कि ग्रेट निकोबार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले व्यापक, स्वतंत्र और पारदर्शी पर्यावरणीय मूल्यांकन हो। स्थानीय समुदायों की सहमति केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि वास्तविक सहभागिता होनी चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण, विकास की अवधारणा में प्रकृति को बराबरी का स्थान दिया जाना चाहिए।

क्योंकि आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमने कितने बंदरगाह बनाए या कितने बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए। वे यह जरूर पूछेंगी कि हमने उनके हिस्से का जंगल क्यों बेच दिया। हमने वह समुद्र क्यों खो दिया जिसमें जीवन साँस लेता था। और हमने उस संतुलन को क्यों तोड़ दिया जो हजारों वर्षों में बना था।

विकास का असली अर्थ निर्माण नहीं, संतुलन है। और अगर यह संतुलन टूट गया, तो कोई भी प्रगति टिकाऊ नहीं रह जाएगी।

आज का राशिफल

वोट करें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एपल प्रमुख टिम कुक से आईफोन का निर्माण भारत में न करने को कहा है। क्या इसका असर देश के स्मार्टफोन उद्योग पर पड़ सकता है?

और भी पढ़ें

WhatsApp