
भारतीय राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान की राजनीतिक बहसों का भी केंद्र बने रहते हैं। नेहरू ऐसा ही एक नाम हैं। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी, लेकिन समय के साथ उनके व्यक्तित्व और निर्णयों को लेकर कई मिथक, आरोप और राजनीतिक आख्यान भी गढ़े गए। सोशल मीडिया के दौर में यह प्रवृत्ति और तेज हुई है, जहां आधी-अधूरी जानकारियां इतिहास का विकल्प बनती जा रही हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नेहरू को न तो अंधभक्ति के चश्मे से देखा जाए और न ही राजनीतिक नफरत के माध्यम से। इतिहास तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि प्रचार पर।
सबसे चर्चित आरोप यह लगाया जाता है कि नेहरू अपने कपड़े पेरिस में धुलवाते थे। यह दावा वर्षों से राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया पर दोहराया जाता रहा है। लेकिन इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। स्वयं नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि उनके बारे में इस तरह की अफवाहें फैलाई जाती थीं। सवाल यह भी है कि उस दौर में, जब देश गुलामी और गरीबी से जूझ रहा था, क्या कोई राष्ट्रीय नेता प्रतिदिन विदेश में कपड़े धुलवा सकता था? यह आरोप तथ्य से अधिक राजनीतिक व्यंग्य प्रतीत होता है।
इसी तरह यह धारणा भी बनाई गई कि नेहरू ने क्रांतिकारियों के लिए कुछ नहीं किया। जबकि वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। भगत सिंह की गिरफ्तारी के दौरान नेहरू उनसे जेल में मिलने गए थे। चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारी नेताओं से भी उनका संवाद था। यह सही है कि कांग्रेस और क्रांतिकारियों की कार्यशैली अलग थी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नेहरू उनके विरोधी थे। स्वतंत्रता आंदोलन अनेक धाराओं का साझा संघर्ष था।
नेहरू को प्रधानमंत्री बनाए जाने को लेकर भी लंबे समय से विवाद खड़ा किया जाता है। कहा जाता है कि वल्लभभाई पटेल को दरकिनार कर महात्मा गांधी ने नेहरू को आगे बढ़ाया। लेकिन इतिहास बताता है कि 1930 के दशक से ही गांधी ने नेहरू को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी माना था। कांग्रेस के भीतर नेहरू की लोकप्रियता व्यापक थी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान मजबूत थी। यह भी सत्य है कि पटेल स्वयं संगठन और प्रशासन के बड़े नेता थे, लेकिन उन्होंने गांधी के निर्णय का समर्थन किया। इसलिए इस पूरे प्रसंग को केवल षड्यंत्र बताना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
कश्मीर का प्रश्न भारतीय राजनीति का सबसे संवेदनशील विषय रहा है। अक्सर यह कहा जाता है कि नेहरू ने ही कश्मीर समस्या को उलझाया। लेकिन यह भूल जाना उचित नहीं होगा कि 1947 में परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं। पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले के बीच जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हुआ। शेख अब्दुल्ला और नेहरू के राजनीतिक संबंधों ने वहां जनसमर्थन जुटाने में भूमिका निभाई, जबकि पटेल रियासतों के विलय की प्रक्रिया संभाल रहे थे। कश्मीर केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि तत्कालीन नेतृत्व का सामूहिक राजनीतिक और सामरिक निर्णय था।
धारा 370 को लेकर भी सारा दोष नेहरू पर डाल दिया जाता है। जबकि ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि उस समय संविधान सभा में अनेक नेताओं की भूमिका थी। यह प्रावधान अस्थायी व्यवस्था के रूप में लाया गया था, जिसका उद्देश्य तत्कालीन परिस्थितियों में जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ के साथ बनाए रखना था। इस मुद्दे को केवल एक व्यक्ति की गलती के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास की जटिलता को नजरअंदाज करना है।
नेहरू औरसुभाष चंद्र बोस के संबंधों को लेकर भी कई विवादित दावे किए जाते हैं। कहा जाता है कि नेहरू ने बोस की जासूसी कराई या उन्हें गिरफ्तार कराने की कोशिश की। लेकिन इन दावों के समर्थन में कोई निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। उल्टा, यह तथ्य सामने आता है कि नेहरू ने आजाद हिंद फौज के सैनिकों के मुकदमों में कानूनी सहायता दी थी। स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद अवश्य थे, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल देना ऐतिहासिक सरलीकरण है।
वंशवाद का आरोप भी नेहरू पर लगाया जाता है। आलोचक कहते हैं कि उन्होंने इंदिरा गांधी को आगे बढ़ाकर लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाया। लेकिन यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री बने थे। इंदिरा गांधी बाद में कांग्रेस संगठन और राजनीतिक परिस्थितियों के चलते उभरीं। इसलिए पूरे वंशवाद का आधार केवल नेहरू को मानना एकतरफा निष्कर्ष होगा।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता को लेकर भी यह कथा लोकप्रिय है कि नेहरू ने भारत के लिए अवसर ठुकरा दिया। जबकि कई शोधकर्ताओं और सरकारी अभिलेखों में इस दावे के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। नेहरू स्वयं संसद में कह चुके थे कि ऐसा कोई औपचारिक प्रस्ताव भारत के सामने नहीं आया था।
असल प्रश्न यह है कि नेहरू को लेकर इतने मिथक क्यों गढ़े गए? इसका उत्तर भारतीय राजनीति में छिपा है। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रही। स्वाभाविक रूप से उसके सबसे बड़े चेहरे नेहरू राजनीतिक आलोचना का केंद्र बने। समय के साथ वैचारिक संघर्ष ने ऐतिहासिक विमर्श को भी प्रभावित किया। सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया, जहां जटिल ऐतिहासिक घटनाओं को कुछ सेकंड के वीडियो और वायरल पोस्ट में बदल दिया जाता है।
यह भी सच है कि नेहरू त्रुटिहीन नहीं थे। चीन नीति, 1962 का युद्ध, आर्थिक मॉडल और कुछ विदेश नीति निर्णयों पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। लोकतंत्र में किसी भी नेता की आलोचना होनी चाहिए। लेकिन आलोचना और मिथ्या प्रचार में फर्क होता है। यदि इतिहास तथ्यों के बजाय राजनीतिक सुविधा से लिखा जाएगा तो आने वाली पीढ़ियां भ्रमित होंगी।








