
देश में पेट्रोल, डीज़ल और सीएनजी की कीमतों में हुई ताज़ा बढ़ोतरी ने आम जनता के बजट पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है। नए संशोधन के बाद पेट्रोल के दाम में लगभग 3.14 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल में 3.11 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं, सीएनजी की कीमतों में भी 2 रुपये प्रति किलोग्राम का इज़ाफ़ा किया गया है।
ईंधन की कीमतों में इस बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव परिवहन लागत पर पड़ रहा है, जिससे रोज़मर्रा की वस्तुओं की ढुलाई महंगी हो गई है। इसका असर धीरे-धीरे खाद्य पदार्थों, सब्ज़ियों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देने की आशंका है। ट्रांसपोर्ट सेक्टर पहले से ही लागत दबाव का सामना कर रहा है और नई दरों से स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई है।
आम उपभोक्ता पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है, ऐसे में ईंधन मूल्य वृद्धि ने घरेलू बजट को और अधिक प्रभावित किया है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन महंगा होने से उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला की लागत बढ़ती है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचता है।
सरकार की ओर से कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के कारण यह समायोजन आवश्यक हो गया है। हालांकि विपक्ष का आरोप है कि सरकार करों में राहत देने के बजाय जनता पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है।
आने वाले समय में यदि कच्चे तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तो महंगाई दर पर और दबाव बढ़ सकता है।
ईंधन की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के बाद राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई है। पेट्रोल और डीज़ल के दामों में 3 रुपये से अधिक की वृद्धि तथा सीएनजी की कीमतों में 2 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी को लेकर विपक्ष ने सरकार पर तीखे हमले किए हैं।
कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार जनता को राहत देने के बजाय कर ढांचे और नीतिगत फैसलों के माध्यम से महंगाई का बोझ सीधे आम नागरिकों पर डाल रही है। विपक्ष का कहना है कि लगातार बढ़ती कीमतों से मध्यम वर्ग और गरीब तबके पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है।
वहीं सरकार और तेल विपणन कंपनियों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के कारण ईंधन की लागत प्रभावित हुई है। ऐसे में कीमतों में यह संशोधन मजबूरी है।





