
इस संसार में सबसे मूल्यवान कोई वस्तु है तो वह है मानव शरीर में जन्म प्राप्त होना। यह वास्तव में ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है। साल १९७६ में अमेरिकन बायोफिजिसिस्ट हैराल्ड मोरोविट्ज़ ने द टाइम्स के अपने एक लेख में यह चौंकाने वाला खुलासा किया कि मानव शरीर के मात्र पुर्जों की कीमत आंकी जाए तो यह साठ लाख डॉलर के बराबर है। आज हम इतना महंगा शरीर लेकर घूमते है और हमे इसकी कीमत तक मालूम नहीं है। मगर क्या इससे भी दुर्लभ वस्तु कुछ हो सकती हैं ? इससे भी दुर्लभ और महत्वपूर्ण वस्तु की हम बात करें तो वह है सच्ची समझ। सच्ची समझ प्राप्त होना आज के इस युग में बहुत ही दुर्लभ है। यह समझ हमें विवेक बुद्धि से प्राप्त होती है। हमने अक्सर बड़ों को यह कहते हुए सुना है, बेटा विवेक से काम लो। क्या है विवेक बुद्धि? क्या यह सामान्य बुद्धि से अलग है? आमतौर पर जब कोई बालक स्कूल में अच्छे अंक प्राप्त करता है या प्रथम श्रेणी पाता है तो हम कहते है, बहुत बुद्धिशाली बालक है। या तो फिर कोई आईआईटी जैसे बड़े कॉलेज में एड्मिशन प्राप्त करता है तो हम उसे भी कहते है, यह बहुत बुद्धिशाली है। लेकिन आज हम समाज में देखते है कि संसार में अपने क्षेत्र में सबसे आगे रहने वाले व्यक्ति भी जीवन में कभी कभी पीछे रह जाते है। अमेरिका विश्व का सबसे विकसित और शक्तिशाली देश होने के बावजूद आज दो देशों के बीच आपसी मतभेद में कितना धन और सैनिक बल गँवा चुका है। भारत की ही बात करें तो हम रोज़ नई घटनाएं देखते है कि कितने पढ़े लिखे युवान आजकल शादी के तुरंत बाद डाइवोर्स लेने कोर्ट में लाइन लगाते फिरते है। यहाँ तक कि अवसाद और डिप्रेशन में आकर आत्महत्या जैसा कदम भी उठाने से पीछे नहीं हटते।
इससे हमें यह समझ आता है कि सामान्य बुद्धि से आप संसार में ऊपर उठ सकते है लेकिन अगर जीवन में ऊपर उठना है तो अध्यात्म में गहरा उतरना होगा। विवेक बुद्धि इसमें हमें मददरूप साबित होती है। विवेक से ही हम सत् और असत् में अंतर जान पाते है। भगवान स्वामिनारायण की परंपरा में अक्षरब्रह्म गुणातीतानंद स्वामी कहते थे, कि, “हमें नित्य यह विचार करना चाहिए कि मैं इस संसार में क्या करने आया हूँ और क्या कर रहा हूँ।” अगर यह स्पष्टता हमें रहेगी तो हम कभी किसी द्वंद या विवाद में नहीं फंसेंगे। कहा जाता है माता कैकयी का भगवान राम के प्रति प्रेम उनकी सगी माँ से भी अधिक था। लेकिन विवेक न होने के कारण ही मंथरा के वाक्जाल में फंसकर उन्होंने उन्हें चौदह वर्ष का वनवास भेज दिया। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी लिखते हैं, “बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।” अर्थात बिना सत्संग और भगवान की कृपा के बिना हमें विवेक प्राप्त नहीं होता। इसलिए ऐसी समझ विकसित करने के लिए नित्य सत्संग का होना अति आवश्यक है। सत्संग का अर्थ है सत्यस्वरुप अपनी आत्मा का संग, सच्चे गुरु का संग, सत्शास्त्रों का संग, सच्चे मित्रों का संग। ब्रह्मस्वरूप महंतस्वामी महाराज अपने स्वलिखित ग्रंथ सत्संग दीक्षा में बताते है कि ऐसा दिव्य सत्संग करने वाला मनुष्य सुखी होता है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्ध डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने अपने ८३ वर्ष के जीवन में अनेक पदों पर रहकर देश के लिए कई बड़े कार्य सिद्ध किये लेकिन आश्चर्य की बात है कि कभी किसी ने उनकी आलोचना नहीं की। उनका चरित्र स्वच्छ और निर्मल था और उनका निजी जीवन साधारण। यही कारण है वह सभी के प्रिय थे। अपनी आत्मकथा में वह बताते है कि उन्होंने अपने जीवन में बहुत से महानुभावों से प्रेरणा ली। जिनमें तिरुक्कुरल, सतीश धवन, डॉ ब्रह्मप्रकाश, विक्रम साराभाई, आदि शामिल थे। वह कुरान और भगवद् गीता का निरंतर अध्ययन करते थे। अपनी अंतिम पुस्तक आरोहण में वह लिखते है कि कैसे प्रमुखस्वामी महाराज के योग में आकर उन्होंने अपने अहंभाव को मिटाना सीखा। ऐसा बताते हुए वह लिखते है, “प्रमुखस्वामी महाराज ने मुझे मैं और मेरा के भाव से ऊपर उठना सिखाया और उन्होंने मुझे ईश्वर के समकक्ष धूरी पर बैठा दिया है”।
इससे हमें यह मालूम होता है कि उन्होंने सच्चे गुरु के सान्निध्य में कितनी गहरी और दृढ़ समझ विकसित की होगी। विवेकशील मनुष्य हर परिस्थिति में स्थिर रहता है और अपने जीवन में आनंद और संतोष का अनुभव करता है। हम भी ऐसे महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर और सच्चे गुरु के सान्निध्य में सत्संग से अपने जीवन में विवेक बुद्धि दृढ़ करें और भगवान के शाश्वत सुख का अनुभव करें।





