
‘कौन अपना है यहाँ…’ यह प्रश्न जितना सरल लगता है, उतना ही गहरा और असहज भी है। यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन की उस सच्चाई की ओर इशारा है जिसे हम अक्सर जानकर भी अनदेखा कर देते हैं कि इस संसार में अपनापन स्थायी सत्य नहीं, बल्कि परिस्थितियों से बना एक अनुभव है। इसी विचार को अपनी शैली में ओशो ने बार-बार अलग-अलग रूपों में समझाने की कोशिश की है।
हम अपने जीवन की शुरुआत से ही रिश्तों में अपना और पराया की दीवारें खड़ी करना सीख लेते हैं। परिवार, मित्र, समाज- सबको हम अपनी सुविधा और भावनात्मक जरूरतों के आधार पर वर्गीकृत कर देते हैं। माँ-बाप, भाई-बहन, दोस्त- ये सब हमें ‘अपने’ लगते हैं, और अनजाने लोग ‘पराए’। लेकिन जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है, अनुभव धीरे-धीरे इस वर्गीकरण को चुनौती देने लगते हैं।
सच्चाई यह है कि इंसान स्थायी नहीं है, उसकी परिस्थितियाँ स्थायी नहीं हैं, और उसके रिश्ते भी स्थायी नहीं हैं। आज जो व्यक्ति हमारे लिए सब कुछ है, कल वही दूरी बना सकता है। आज जो अजनबी है, कल वही सबसे बड़ा सहारा बन सकता है। इस बदलते हुए समीकरण के बीच ‘अपना कौन है’ यह प्रश्न और भी तीखा हो जाता है।
ओशो का दृष्टिकोण यहाँ बहुत अलग और कई बार असहज करने वाला है। वे यह नहीं कहते कि रिश्ते गलत हैं, बल्कि वे यह कहते हैं कि रिश्तों को ‘पकड़’ मत बना दो। उनके अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा दुख इस भ्रम से पैदा होता है कि जो हमारे साथ है, वह हमेशा वैसा ही रहेगा, हमेशा वैसा ही महसूस करेगा और हमेशा हमारे अनुसार ही चलेगा। यही अपेक्षा टूटती है, और वहीं से पीड़ा शुरू होती है।
समाज हमें सिखाता है कि रिश्तों में अधिकार होता है, लेकिन ओशो इसके उलट एक गहरी बात कहते हैं- जहाँ अधिकार शुरू होता है, वहीं प्रेम धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। क्योंकि अधिकार मांग पैदा करता है, और मांग पूरा न होने पर असंतोष जन्म लेता है। यही असंतोष रिश्तों को भीतर से खोखला कर देता है।
इस संदर्भ में ‘कौन अपना है यहाँ’ केवल निराशा का वाक्य नहीं है, बल्कि यह एक जागरूकता की ओर संकेत है। यह हमें यह समझने के लिए प्रेरित करता है कि संबंधों को पकड़कर नहीं, बल्कि समझकर जीया जाए। जो साथ है, उसके साथ प्रेम रहे, लेकिन यह अपेक्षा न रहे कि वह हमेशा वैसा ही रहेगा।
आधुनिक जीवन में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो गया है। तेज़ रफ्तार जीवन, बदलते करियर, स्थानांतरण, डिजिटल रिश्ते- इन सबने संबंधों की प्रकृति को और अधिक अस्थिर बना दिया है। आज मित्रता सोशल मीडिया पर बनती है और वहीं टूट भी जाती है। परिवार साथ रहते हुए भी कई बार भावनात्मक रूप से दूर हो जाते हैं। ऐसे में ‘अपनापन’ एक भावनात्मक अनुभव तो बनता है, लेकिन उसकी स्थायित्व की गारंटी नहीं रह जाती।
लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि जीवन में रिश्तों का कोई मूल्य नहीं। बल्कि इसके विपरीत, रिश्ते ही जीवन को अर्थ देते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें किस दृष्टि से देखा जाए। यदि हम रिश्तों को अधिकार और अपेक्षा के आधार पर देखेंगे, तो वे बोझ बन जाएंगे। लेकिन यदि हम उन्हें स्वतंत्रता और समझ के आधार पर देखेंगे, तो वे जीवन को समृद्ध करेंगे।
ओशो का संदेश कहीं न कहीं इसी संतुलन की ओर इशारा करता है- प्रेम करो, लेकिन पकड़ मत बनो। साथ रहो, लेकिन स्वतंत्रता को मत खोओ। क्योंकि जैसे ही हम किसी को ‘अपना’ मानकर बाँधने लगते हैं, हम न केवल उसे सीमित करते हैं, बल्कि खुद भी भीतर से बंधने लगते हैं।
इस प्रश्न का सबसे गहरा पहलू यह है कि शायद यह दूसरों के बारे में कम और हमारे अपने मन के बारे में अधिक है। ‘कौन अपना है यहाँ’ असल में यह पूछता है कि हम स्वयं को कितना समझते हैं। क्या हम अपनी भावनाओं के मालिक हैं, या परिस्थितियों के गुलाम?
अंततः, यह संपादकीय किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश नहीं करता, बल्कि एक दृष्टि बदलने का आग्रह करता है। जीवन को रिश्तों के स्थायी नक्शे की तरह नहीं, बल्कि बदलते अनुभवों की एक धारा की तरह देखा जाए। जो भी साथ है, उसे पूरी तरह जीया जाए- बिना भय के, बिना अत्यधिक अपेक्षा के।
क्योंकि शायद सच्चाई यही है- यहाँ कोई पूरी तरह ‘अपना’ नहीं है, लेकिन हर कोई उस क्षण में अपना-सा जरूर लग सकता है, जब हम प्रेम को पकड़ नहीं, समझ बना लेते हैं।








