
भारत इस समय जिस मौसमीय दौर से गुजर रहा है, वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। देश के एक हिस्से में जहां लू और 44–47°C तक की भीषण गर्मी लोगों को झुलसा रही है, वहीं दूसरे हिस्सों में अचानक आंधी, बारिश और ओलावृष्टि राहत के साथ-साथ तबाही भी लेकर आ रही है। यह विरोधाभासी मौसम अब अपवाद नहीं, बल्कि एक उभरती हुई जलवायु प्रवृत्ति बनता जा रहा है।
शनिवार को देश के 9 राज्यों में आंधी-बारिश और ओलों का अलर्ट जारी किया गया है। मौसम में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक गिरावट की संभावना बताई जा रही है। यह बदलाव राहत जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपा असंतुलन गंभीर चिंता का विषय है।
तापमान का टूटता संतुलन
उत्तर प्रदेश में इस समय मौसम का चरम विरोधाभास साफ दिखाई दे रहा है। उरई में तापमान 41.6°C दर्ज किया गया, जबकि हरदोई में यह गिरकर 17°C तक पहुंच गया। कुछ दिन पहले बांदा में तापमान 47.6°C तक पहुंचा था, जो अब 5-6 डिग्री तक गिर चुका है। यह उतार-चढ़ाव केवल संयोग नहीं है। यह संकेत है कि वातावरण में ऊर्जा और नमी का संतुलन बिगड़ चुका है। जब गर्म हवा अत्यधिक ऊपर उठती है और ठंडी हवा से टकराती है, तो आंधी, बिजली और ओलावृष्टि जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ती हैं।
आंधी, ओले और आपदाएँ: एक नया पैटर्न
मध्य प्रदेश में पिछले कुछ दिनों में 35 से अधिक जिलों में आंधी, बारिश और ओले दर्ज किए गए हैं। 30–50 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाएं अब सामान्य घटना बनती जा रही हैं। वहीं बिहार में भी ऑरेंज अलर्ट के बीच बिजली गिरने से जानमाल का नुकसान हुआ है।
राजस्थान में स्थिति और जटिल है-जहां एक तरफ बाड़मेर और बीकानेर में तापमान 44°C से ऊपर है, वहीं दूसरी तरफ 16 जिलों में आंधी-बारिश का अलर्ट जारी है। यह दोहरी स्थिति बताती है कि मौसम अब एक स्थिर पैटर्न में नहीं है।
मानसून से पहले ही ‘मौसम युद्ध’
देश के कई हिस्सों-जैसे असम, ओडिशा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु-में भारी बारिश दर्ज की गई है। वहीं उत्तराखंड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत में ओलावृष्टि और तूफान की घटनाएं बढ़ी हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि मानसून से पहले ही वातावरण में अत्यधिक नमी और अस्थिरता बन चुकी है। यही कारण है कि एक ही समय में कहीं सूखा और लू है, तो कहीं बाढ़ और बारिश।
भूस्खलन और स्थानीय आपदाएँ
कश्मीर की चिनाब घाटी में लैंडस्लाइड के कारण डोडा-किश्तवाड़ मार्ग बंद हो गया, और 100 से अधिक वाहन फंस गए। यह घटना केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि बढ़ती प्राकृतिक अस्थिरता का उदाहरण है।
पहाड़ी क्षेत्रों में अनियंत्रित बारिश और तापमान परिवर्तन अब भूस्खलन की घटनाओं को बढ़ा रहे हैं, जिससे बुनियादी ढांचे पर गंभीर दबाव पड़ रहा है।
जलवायु संकेत क्या कहते हैं?
मौसम विभाग के अनुसार मई में देश के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश होने की संभावना है, जबकि कुछ क्षेत्रों में तापमान सामान्य से कम रह सकता है। वहीं गुजरात और महाराष्ट्र में हीटवेव की स्थिति सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है। यह ‘मिश्रित मौसम’ स्पष्ट रूप से दिखाता है कि भारत अब एक स्थिर जलवायु से हटकर ‘अत्यधिक अस्थिर जलवायु’ की ओर बढ़ रहा है।
बड़ा सवाल: क्या यह नया सामान्य है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सब अस्थायी है या एक नए जलवायु युग की शुरुआत?
वैज्ञानिक अध्ययन पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि:
गर्मी बढ़ रही है
बारिश का पैटर्न बदल रहा है
और चरम मौसम घटनाएं (extreme events) अधिक बार हो रही हैं
इसका मतलब है कि आने वाले समय में:
लू और ओले दोनों बढ़ सकते हैं
बेमौसम बारिश आम हो सकती है
और मौसम का अनुमान लगाना कठिन होता जाएगा








