
दिल्ली में इमारत गिरने की खबर अब इतनी असामान्य नहीं रह गई है। यह बात अपने आप में राजधानी के प्रशासन के लिए शर्मनाक होनी चाहिए। किसी शहर में यदि जर्जर और अवैध इमारतें लगातार बनती रहें, उनमें लोग रहते रहें और फिर एक-एक करके वे मौत का कारण बनती रहें तो इसे महज दुर्भाग्य नहीं कहा जा सकता। यह एक व्यवस्थित प्रशासनिक विफलता है।
सत्य निकेतन की घटना ने फिर वही सवाल खड़ा किया है- अवैध और खतरनाक इमारतें आखिर बनती कैसे हैं और प्रशासन को उनकी जानकारी तब क्यों होती है जब वे गिर जाती हैं?
सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास का इलाका है। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आए छात्र पीजी और किराये के कमरों में रहते हैं। ऐसे इलाके में भवन सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन रविवार को एक पीजी वाली इमारत के ढहने से कई लोग मलबे में दब गए। बचाव अभियान लंबा चला और कई लोगों की जान चली गई।
घटना के बाद कई तरह के सवाल सामने आए हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक इमारत के बेसमेंट में कई दिनों से तोड़फोड़ और खुदाई का काम चल रहा था। बेसमेंट में पानी भरा था और संरचना पहले से कमजोर बताई जा रही थी। खुदाई के दौरान एक पिलर खिसकने की बात सामने आई। यदि ये तथ्य जांच में सही साबित होते हैं तो यह केवल इमारत की कमजोरी का मामला नहीं रहेगा, बल्कि निर्माण गतिविधि की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठेंगे।
सबसे बड़ा सवाल MCD की निगरानी व्यवस्था को लेकर है। बताया गया है कि सरकारी रिकॉर्ड में यह इमारत खतरनाक घोषित नहीं थी। यदि रिकॉर्ड में इमारत सुरक्षित थी लेकिन जमीन पर उसकी स्थिति ऐसी थी कि वह भरभराकर गिर गई, तो रिकॉर्ड और वास्तविकता के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों था?
और अगर इमारत में अवैध तरीके से बदलाव किए गए थे, मंजिलें बढ़ाई गई थीं या संरचना के साथ छेड़छाड़ हो रही थी, तो यह काम एक दिन में तो नहीं हुआ होगा। निर्माण धीरे-धीरे हुआ होगा। मजदूर आए होंगे। सामग्री पहुंची होगी। पड़ोसियों ने देखा होगा। किरायेदार रहे होंगे। फिर प्रशासन की नजर कहां थी?
यही सवाल दिल्ली के दूसरे हादसों पर भी लागू होता है।
जुलाई में रोहिणी में निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत गिरने से तीन मजदूरों की मौत हो गई। मई में सैदुलाजाब में पांच मंजिला इमारत ढहने से छह लोगों की जान गई। 2025 में वेलकम, पहाड़गंज और मुस्तफाबाद में भी इमारत ढहने की घटनाओं में लोगों की मौत हुई। यानी समस्या किसी एक इलाके या किसी एक साल तक सीमित नहीं है।
हर हादसे के बाद एक परिचित पटकथा सामने आती है। प्रशासन मौके पर पहुंचता है। राहत और बचाव अभियान शुरू होता है। मृतकों के परिवारों के लिए संवेदना व्यक्त की जाती है। जांच के आदेश दिए जाते हैं। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है। कुछ अवैध इमारतों को सील करने की बात कही जाती है। फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाता है।
लेकिन अगली इमारत फिर गिर जाती है।
इस चक्र को तोड़ना होगा।
दिल्ली सरकार को अब सिर्फ हादसों के बाद कार्रवाई करने वाली व्यवस्था से आगे बढ़ना होगा। राजधानी में भवन सुरक्षा का एक व्यापक ऑडिट होना चाहिए। खासकर उन इलाकों में जहां पुरानी इमारतों को पीजी, हॉस्टल, ऑफिस या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में बदला गया है। ऐसी इमारतों में बिना अनुमति किए गए संरचनात्मक बदलावों की जांच जरूरी है।
अवैध निर्माण रोकने की जिम्मेदारी केवल मकान मालिक की नहीं है। मालिक कानून तोड़ता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सवाल यह भी है कि कानून लागू कराने वाला तंत्र क्या कर रहा था। भ्रष्टाचार, मिलीभगत या लापरवाही- जो भी कारण हो, उसकी पहचान जरूरी है।
सरकारें अक्सर अवैध निर्माण को सील करने या गिराने की बात करती हैं। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई निर्माण शुरू होने के समय क्यों नहीं होती? जब पहली मंजिल नियम के खिलाफ बनती है, तभी उसे रोकना आसान है। चार मंजिल बनने और दर्जनों लोगों के रहने के बाद कार्रवाई करना न सिर्फ मुश्किल है, बल्कि खतरनाक भी।
इसी तरह भवन मालिकों के साथ-साथ अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी। किसी इलाके में लगातार अवैध निर्माण हो रहा है तो वहां तैनात अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए कि उन्हें इसकी जानकारी क्यों नहीं थी। यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई। और अगर कार्रवाई की गई थी तो निर्माण फिर कैसे जारी रहा?
सत्य निकेतन में मालिक हरिराम बंसल के खिलाफ मामला दर्ज होना और उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीमें बनना जरूरी कदम हैं। लेकिन इसे अंतिम कार्रवाई मानना पर्याप्त नहीं होगा। एक मालिक को गिरफ्तार कर देने से दिल्ली की भवन सुरक्षा व्यवस्था ठीक नहीं हो जाएगी।
सरकार को एक सार्वजनिक और पारदर्शी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिसमें लोगों को यह पता चल सके कि उनके इलाके की कौन सी इमारत सुरक्षित है, कौन सी इमारत जर्जर है और किन भवनों के खिलाफ कार्रवाई लंबित है। शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो और उसकी जानकारी सार्वजनिक की जाए।
सबसे जरूरी बात यह कि भवन सुरक्षा को सिर्फ नगर निगम की फाइलों का विषय न समझा जाए। यह जीवन और मृत्यु का प्रश्न है।
मलबे के नीचे दबा व्यक्ति यह नहीं पूछता कि इमारत का नक्शा किसने पास किया था। मरने वाले मजदूर का परिवार यह नहीं पूछता कि फाइल किस अधिकारी की मेज पर थी। छात्र के माता-पिता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इमारत रिकॉर्ड में खतरनाक घोषित थी या नहीं। उन्हें सिर्फ यह चाहिए कि उनका बच्चा सुरक्षित घर लौटे।
इसलिए अब समय है कि दिल्ली में हर इमारत के गिरने के बाद यह सवाल पूछना बंद किया जाए कि हादसा कैसे हुआ। असली सवाल पहले पूछा जाना चाहिए—इमारत को गिरने से पहले क्यों नहीं रोका गया?
यदि सरकार इस सवाल का जवाब नहीं खोजती तो अगला हादसा सिर्फ एक नई खबर होगा। और उसके बाद फिर एक जांच, फिर कुछ बयान और फिर किसी दूसरी इमारत का मलबा।
राजधानी को इस अंतहीन सिलसिले से बाहर निकलना होगा। अवैध निर्माण को बनने देना भी लापरवाही है और उसे गिरने देना भी। फर्क सिर्फ इतना है कि पहली लापरवाही कागज पर होती है, दूसरी में इंसान मरते हैं।







