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महँगाई, युद्ध और अर्थव्यवस्था: आखिर जिम्मेदार कौन?

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Written by
Rishabh Rai

पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने आम आदमी की चिंता बढ़ा दी है। सरकार इसकी वजह मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक तेल संकट को बता रही है। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत जैसे बड़े देश ने पिछले 12 वर्षों में खुद को ऐसे संकटों से बचाने की पर्याप्त तैयारी की? अगर नहीं, तो इसकी राजनीतिक और आर्थिक जिम्मेदारी किसकी है?

2014 में जब नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई थी, तब देश को मजबूत अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक स्तर पर आत्मनिर्भर भारत का सपना दिखाया गया था। ‘न्यू इंडिया’ का नारा दिया गया, लेकिन आज जब तेल संकट सामने है तो देश की असल तैयारी पर सवाल खड़े हो रहे हैं। भारत आज भी अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। पिछले वर्षों में न तो घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई और न ही रणनीतिक भंडारण क्षमता उस स्तर तक पहुंच पाई, जो किसी बड़े वैश्विक संकट का सामना कर सके।

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सरकार यह जरूर कह रही है कि तेल कंपनियां घाटा झेल रही हैं और टैक्स में कटौती कर जनता को राहत दी जा रही है। लेकिन यह भी सच है कि बीते वर्षों में पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ाकर केंद्र और राज्यों ने भारी राजस्व कमाया। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम थीं, तब आम उपभोक्ता को उसका पूरा लाभ नहीं मिला। आज जब संकट आया है तो जनता से कहा जा रहा है कि हालात वैश्विक हैं और देश को मिलकर सामना करना होगा।

आर्थिक मोर्चे पर सबसे बड़ा सवाल आम नागरिक की आय को लेकर है। क्या बीते 12 वर्षों में लोगों की कमाई उस गति से बढ़ी, जिस गति से महंगाई बढ़ी? मध्यम वर्ग, किसान, छोटे व्यापारी और नौकरीपेशा तबका लगातार दबाव में है। रोजगार के अवसर सीमित हुए हैं, असंगठित क्षेत्र अभी तक नोटबंदी और महामारी के झटकों से पूरी तरह उबर नहीं पाया है। ऐसे में ईंधन महंगा होने का सीधा असर हर घर की रसोई, परिवहन और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है।

विपक्ष और कई आर्थिक विशेषज्ञ आरोप लगाते रहे हैं कि पिछले दशक में सरकार ने गंभीर आर्थिक विमर्श के बजाय भावनात्मक और प्रतीकात्मक राजनीति को ज्यादा प्राथमिकता दी। नोटबंदी, थाली बजाने या सोना न खरीदने जैसी अपीलों को आलोचक ‘आर्थिक प्रबंधन’ नहीं बल्कि ‘राजनीतिक संदेश’ मानते हैं। इन कदमों का वास्तविक आर्थिक प्रभाव क्या रहा, इस पर आज भी बहस जारी है।

यह भी सच है कि किसी भी सरकार के लिए वैश्विक संकटों से पूरी तरह बच पाना संभव नहीं होता। कोविड महामारी और युद्ध जैसी परिस्थितियों ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। लेकिन मजबूत सरकार वही मानी जाती है जो संकट आने से पहले तैयारी करे। ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार, महंगाई नियंत्रण और आय वृद्धि जैसे मुद्दों पर दीर्घकालिक नीति की जरूरत थी, जिसकी कमी आज महसूस हो रही है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हिन्दी भाषी राज्यों में आर्थिक मुद्दे कभी चुनावी बहस का केंद्र नहीं बन पाए। जाति, धर्म और भावनात्मक नारों के बीच रोजगार, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सवाल पीछे छूटते रहे। यही कारण है कि सरकारों पर आर्थिक जवाबदेही का दबाव उतना नहीं बन पाया, जितना बनना चाहिए था।

आज जरूरत सिर्फ सरकार की आलोचना या समर्थन की नहीं है, बल्कि आर्थिक समझ विकसित करने की है। लोकतंत्र में जागरूक नागरिक ही सरकारों को जवाबदेह बनाते हैं। अगर जनता महंगाई, टैक्स, रोजगार और आर्थिक नीतियों पर गंभीर सवाल पूछना शुरू करे, तभी नीतियों में वास्तविक बदलाव संभव होगा।

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