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रोमांस और इमोशन का वादा, लेकिन धीमी रफ्तार में उलझी ‘एक दिन’

फिल्म एक दिन
फिल्म एक दिन
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Written by
Rishabh Rai

बॉलीवुड में कभी-कभी ऐसे कॉम्बिनेशन सामने आते हैं जो कागज़ पर बेहद मजबूत लगते हैं, लेकिन पर्दे पर आते-आते फीके पड़ जाते हैं। ऐसी ही फिल्म है ‘एक दिन’, जिसमें अमिर खान के बेटे जुनैद खान और साउथ की मशहूर एक्ट्रेस साई पल्लवी पहली बार साथ नजर आए हैं। जापान की बर्फीली लोकेशंस, एक इमोशनल प्रेम कहानी और “एक दिन” में बदलती किस्मत का आइडिया-सब कुछ आकर्षक लगता है, लेकिन फिल्म उस उम्मीद पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।

कहानी: एकतरफा प्यार और यादों का खेल

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फिल्म की कहानी दिनेश (जुनैद खान) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक इंट्रोवर्ट कंप्यूटर इंजीनियर है और ऑफिस में लगभग ‘अदृश्य’ माना जाता है। उसे अपनी सहकर्मी मीरा (साई पल्लवी) से एकतरफा प्यार है। मीरा चुलबुली, आत्मविश्वासी और हर फ्रेम में जीवंत नजर आती है।

कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है जब पूरी टीम जापान के सपोरो शहर जाती है, जहां स्नो फेस्टिवल चल रहा होता है। यहां मीरा एक हादसे के बाद अस्थायी याददाश्त खो देती है। दिनेश को लगता है कि यह मौका उसकी किस्मत बदल सकता है। इसके बाद कहानी प्यार, भ्रम और भावनाओं के बीच आगे बढ़ती है, लेकिन दर्शक के लिए यह सफर धीरे-धीरे भारी पड़ने लगता है।

फिल्म कैसी है: धीमी रफ्तार और पुराना फॉर्मूला

‘एक दिन’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी रफ्तार और पुरानी सोच है। आज का दर्शक या तो तेज़ थ्रिलर देखना चाहता है या मजबूत कंटेंट वाली रियलिस्टिक फिल्में। ऐसे में यह फिल्म 90 के दशक के रोमांटिक फॉर्मूले में फंसी नजर आती है।

ऑफिस रोमांस, बॉस-एम्प्लॉई की खींचतान और एकतरफा प्यार जैसे ट्रैक अब नए नहीं लगते। फिल्म का भावनात्मक आधार कमजोर है, जिससे कहानी कई जगहों पर खिंची हुई महसूस होती है। यह साफ लगता है कि यह फिल्म थिएटर से ज्यादा ओटीटी के लिए बेहतर फिट होती।

डायरेक्शन और तकनीकी पक्ष

फिल्म का सबसे मजबूत पहलू इसकी सिनेमैटोग्राफी है। जापान के सपोरो की बर्फीली वादियां, स्नो फेस्टिवल और खूबसूरत विजुअल्स पर्दे पर शानदार दिखते हैं। कैमरा वर्क कहानी को एक विजुअल ट्रीट जरूर बनाता है।

लेकिन निर्देशन में वह पकड़ नहीं दिखती जो एक रोमांटिक ड्रामा को असरदार बना सके। कहानी की गति बेहद धीमी है और कई जगहों पर फिल्म भावनात्मक जुड़ाव बनाने में असफल रहती है। बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण उसका असर सीमित रह जाता है।

एक्टिंग: जुनैद का प्रयास और साई पल्लवी की चमक

जुनैद ने अपने किरदार में मेहनत की है, लेकिन कई जगह उनकी परफॉर्मेंस ओवरड्रामेटिक लगती है। वह किरदार में इतना डूब जाते हैं कि उसकी सादगी खो जाती है। कभी-कभी उनकी एक्टिंग बनावटी महसूस होती है।

वहीं साई पल्लवी इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस, एक्सप्रेशन और नैचुरल एक्टिंग हर सीन को जीवंत बनाती है। हालांकि, उनके किरदार को पूरी तरह से उपयोग नहीं किया गया, जो एक बड़ी चूक लगती है।

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