
गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित कनावनी की वह दोपहर अब एक तारीख भर नहीं रही-वह एक गहरी चोट बन चुकी है, जो सैकड़ों जिंदगियों पर दर्ज हो गई। गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे लगी भीषण आग ने 125 झुग्गियों और 12 से अधिक गोदामों को अपनी चपेट में लेकर सब कुछ राख में बदल दिया। चार घंटे तक 22 दमकल गाड़ियों की मशक्कत के बाद आग पर काबू तो पाया गया, लेकिन तब तक कई परिवारों का पूरा संसार खत्म हो चुका था।
अगले दिन भी जब इलाके में धुआं और सुलगन बाकी थी, उसी बीच ‘अवध सूत्र’ की टीम मौके पर पहुंची। यह वह क्षण था, जहां पत्रकारिता सिर्फ सूचना देने का माध्यम नहीं रही, बल्कि संवेदनाओं को समझने और उन्हें शब्द देने की जिम्मेदारी बन गई।
‘अवध सूत्र’ दिल्ली के संपादक ऋषभ राय ने जब उस मंजर को देखा, तो उनकी दृष्टि सिर्फ जली हुई झुग्गियों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने उन चेहरों को पढ़ा, जो खामोश थे लेकिन बहुत कुछ कह रहे थे। उन्होंने प्रशासन से बातचीत की-राहत, पुनर्वास और जांच को लेकर जरूरी सवाल उठाए। प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को आर्य शिक्षा निकेतन सरकारी स्कूल में शिफ्ट किया है और तत्काल राहत के तौर पर 5 हजार रुपये की सहायता दी है, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि क्या यह मदद उन टूटे हुए सपनों को जोड़ पाएगी?
इस पूरी कवरेज में एक नाम सबसे मजबूत और प्रभावशाली तरीके से सामने आता है-कृष्णा गुप्ता। एक पत्रकार के तौर पर उनकी पकड़ और एक समाजसेवी के रूप में उनकी संवेदनशीलता, दोनों उस दिन साफ नजर आईं। कृष्णा गुप्ता ने इस घटना को सिर्फ एक खबर की तरह नहीं देखा, बल्कि एक जिम्मेदारी की तरह लिया। वह हर उस व्यक्ति के पास रुके, जिसने कुछ खोया था-उन्होंने सुना, समझा और महसूस किया।
उनकी मौजूदगी में एक अलग तरह की गंभीरता और भरोसा था। जहां कई लोग सिर्फ तस्वीरों में कहानी ढूंढते हैं, वहीं कृष्णा गुप्ता ने लोगों की आंखों में छिपे दर्द को पढ़ा। यही वह फर्क है, जो एक सामान्य पत्रकार और एक सच्चे जमीनी इंसान में होता है। उनकी सक्रियता और संवेदनशीलता ने इस कवरेज को सिर्फ रिपोर्टिंग नहीं रहने दिया, बल्कि एक मानवीय दस्तावेज बना दिया।
राहुल चौहान ने भी इस पूरे घटनाक्रम को बेहद करीब से देखा और अनुभव किया। उनके लिए यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव था, जिसने भीतर तक झकझोर दिया।
इस बीच, एक और बात जो ‘अवध सूत्र’ को अलग बनाती है-वह है उसका नजरिया। ‘अवध सूत्र’ कभी भी तस्वीरों के लिए काम नहीं करता, बल्कि हकीकत को जानने और समझने के लिए काम करता है। इस बार भी टीम ने वही किया, जो वह वर्षों से करती आ रही है। किसी की बेबसी को कैमरे में कैद करने की बजाय, उसे समझने की कोशिश की गई। कोई तस्वीर नहीं खींची गई, कोई दिखावा नहीं किया गया-सिर्फ सच्चाई को महसूस किया गया और उसे शब्दों में ढाला गया।
आग की इस त्रासदी ने सिर्फ इंसानों को ही नहीं, बल्कि बेजुबानों को भी नहीं बख्शा। पास में स्थित एक डॉग शेल्टर, जो फेरी फाउंडेशन द्वारा पिछले 6 वर्षों से चलाया जा रहा था, वह भी इसकी चपेट में आ गया। करीब 70 कुत्तों में से कई को बचा लिया गया, लेकिन 7 की मौत हो गई। यह दृश्य इस घटना की पीड़ा को और गहरा कर देता है। कनावनी की यह आग सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक आईना है-जो हमें दिखाता है कि समाज के एक हिस्से में जिंदगियां कितनी नाजुक हालात में जी रही हैं। ‘अवध सूत्र’ की इस ग्राउंड रिपोर्ट ने एक बार फिर यह साबित किया कि सच्ची पत्रकारिता वही है, जो दिखावे से दूर रहकर सच्चाई के करीब जाती है। और इस सच्चाई को सामने लाने में कृष्णा गुप्ता जैसे लोग सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक मजबूत पहचान बनकर उभरते हैं-जो खबर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाते हैं।






