
नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर इन दिनों गंभीर बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ सरकार भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बता रही है, वहीं दूसरी तरफ रुपये की लगातार गिरावट, विदेशी निवेश में भारी कमी और वैश्विक तेल संकट ने आर्थिक मोर्चे पर दबाव बढ़ा दिया है। अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला की टिप्पणी के बाद अब अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स भी इस संकट की ओर इशारा कर रही हैं।
हाल के दिनों में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक RBI को रुपये को संभालने के लिए बाजार में 2 से 3 अरब डॉलर तक बेचने पड़े। रिपोर्ट में कहा गया कि सिर्फ दो हफ्तों में रुपया करीब 2.5% टूट गया और 96 प्रति डॉलर के पार पहुंच गया।
Bloomberg की रिपोर्ट का हवाला देते हुए Reuters ने बताया कि RBI अब रुपये को स्थिर रखने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। इनमें ब्याज दरें बढ़ाना, NRI डिपॉजिट के जरिए डॉलर जुटाना और विदेशी निवेशकों के लिए बॉन्ड टैक्स कम करना शामिल है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा समेत शीर्ष अधिकारियों ने इस पर कई आंतरिक बैठकें की हैं।
अगर RBI ब्याज दरें बढ़ाता है तो इसका सबसे बड़ा असर आम आदमी पर पड़ेगा। होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन की EMI बढ़ जाएगी। छोटे कारोबारियों के लिए कर्ज महंगा हो जाएगा। बाजार में खर्च कम होगा और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इसे ‘स्टैगफ्लेशन’ जैसे खतरे की शुरुआती चेतावनी मान रहे हैं, जहां महंगाई भी बढ़ती है और विकास भी धीमा पड़ता है।
विदेशी निवेश के आंकड़े भी चिंता बढ़ा रहे हैं। Times of India की रिपोर्ट के अनुसार FY25 में भारत का नेट FDI 96.5% गिरकर सिर्फ 35.3 करोड़ डॉलर रह गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। RBI के अनुसार विदेशी निवेशकों ने IPO और शेयर बाजार से भारी मुनाफावसूली की और करीब 49 अरब डॉलर बाहर निकाल लिए। Hyundai, Swiggy, Airtel और ITC जैसी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर निवेशकों ने पैसा निकाला।
सिर्फ FDI ही नहीं, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) भी तेजी से बाहर जा रहा है। Times of India की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 2026 में विदेशी निवेशकों की निकासी 2 लाख करोड़ रुपये पार कर चुकी है और भारतीय शेयर बाजार में विदेशी हिस्सेदारी 14 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है।
आर्थिक संकट की एक बड़ी वजह वैश्विक तेल संकट भी बन रहा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान संकट की वजह से तेल की कीमतों में तेजी आई है। इससे भारत का आयात बिल बढ़ रहा है और डॉलर की मांग लगातार बढ़ रही है। Reuters ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ऊंचे तेल दाम इस समय रुपये पर सबसे बड़ा दबाव बना रहे हैं।
कमजोर रुपया सीधे तौर पर महंगाई बढ़ाता है। पेट्रोल-डीजल महंगा होता है, जिससे ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ता है। इसका असर सब्जियों, खाने-पीने के सामान, गैस सिलेंडर और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर पड़ता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, लैपटॉप और विदेश से आने वाले सामान भी महंगे हो जाते हैं। मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोगों पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ता है।
हालांकि सरकार का कहना है कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। सरकार मेक इन इंडिया, PLI स्कीम, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और डिजिटल इकोनॉमी पर जोर दे रही है। RBI ने भी रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड सरकार को ट्रांसफर किया है, जिससे वित्तीय दबाव कम करने की कोशिश होगी। लेकिन Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक यह रकम बाजार की उम्मीद से कम रही और वित्तीय घाटा बढ़ने का खतरा अब भी बना हुआ है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत अभी आर्थिक आपदा की स्थिति में नहीं है, लेकिन चेतावनी संकेत लगातार बढ़ रहे हैं। अगर तेल की कीमतें ऊंची रहीं, डॉलर मजबूत रहा और विदेशी निवेश बाहर जाता रहा तो रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है। कुछ विश्लेषकों ने तो यहां तक कहा है कि हालात खराब होने पर रुपया 100 प्रति डॉलर तक भी जा सकता है।
दुनिया जिस भारत को अगले आर्थिक पावरहाउस के रूप में देख रही थी, वहां अब सवाल उठ रहे हैं कि विकास की चमक के पीछे क्या आर्थिक कमजोरी छिपी हुई है। आने वाले महीनों में RBI और सरकार के फैसले तय करेंगे कि यह दबाव अस्थायी है या बड़े आर्थिक संकट की शुरुआत।








