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युवा संघर्षरत, कॉकरोच निश्चिंत: अवध सूत्र पर एक छोटे पत्रकार की रिपोर्ट, चीफ जस्टिस साहब

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Written by
Rishabh Rai

देश का भविष्य युवा है, कहते हैं। लेकिन अगर यही युवा बेरोजगारी के दलदल में फंसा हुआ हो, तो क्या बचता है? हमारी नई परिभाषा यही है- ‘कॉकरोच प्रधान देश।’ हाँ, जज साहब, आप कान पकड़ लें, अगर कुछ भी बोल दिया तो मुकदमा हो जाएगा। लेकिन हम, देश के बेरोजगार युवा की तरफ से छोटे से पत्रकार की कलम के जरिए सच बोलने की हिम्मत रखते हैं।

सोचिए, घर-घर में कॉकरोच सुरक्षित हैं, लेकिन युवा अपने घर से निकलते ही बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सिस्टम के जाल में फंस जाते हैं। नौकरी? अवसर? वो तो सिर्फ सरकारी विज्ञापनों में दिखते हैं। और अगर कोई कॉकरोच गलती से आपके रास्ते में आ जाए, तो पूरा देश ‘हाय, कितनी फुर्ती!’ कहकर उसकी तारीफ करता है। वही युवा, जो देश की अर्थव्यवस्था को खड़ा कर सकता था, उसे बेरोजगारी की अंधेरी कोठरी में धकेल दिया गया। यही है हमारी कॉकरोच प्रधान व्यवस्था- जीवित कीट को प्राथमिकता, इंसान को नजरअंदाज।

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कॉकरोच हर मुश्किल में टिकता है। और हमारे युवा? मेहनत, उम्मीद और शिक्षा के बावजूद, बेरोजगारी के जंगल में भटक रहे हैं। सरकारी और निजी नौकरी पाने का प्रोसेस ऐसा जटिल है कि लगता है जैसे आप किसी विषैला कॉकरोच पकड़ने की तैयारी कर रहे हों। फ़ॉर्म, लिंक, नियम- हर जगह जाल बिछा हुआ है।

युवा दिन-रात अपनी स्किल बढ़ाने में लगा है। लेकिन समाज और सिस्टम की नजर में, युवा ‘शोर करने वाला’ और कॉकरोच ‘स्मार्ट जीव’ है। कॉलेज से लेकर ऑफिस तक, युवा सवाल उठाते हैं, दिक्कत बताते हैं, लेकिन उन्हें डर, मुकदमा और भ्रष्टाचार की तलवार हमेशा धमका रही है।

देश में बेरोजगारी के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। लेकिन हमारी सरकार और मीडिया का ध्यान कॉकरोच की नई नस्ल पर है। हाईटेक कॉकरोच रिपेलेंट, कॉकरोच फ्री जमानत, कॉकरोच रैंकिंग- पर युवा रोजगार पर कोई ठोस योजना नहीं। यही है देश का व्यंग्यपूर्ण सच।

कभी-कभी स्किल डेवलपमेंट स्कीम, स्टार्टअप प्रोग्राम, या रोजगार मेले आते हैं। लेकिन असली जमीन पर असर? शून्य। युवा उसी तरह अपने सपनों की लाशें ढूंढ रहे हैं, जैसे कॉकरोच अपने छिपने की जगह।

देश की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कॉकरोच से लड़ने के लिए हर सरकार पैकेज देती है, लेकिन युवा बेरोजगार छोड़ दिए जाते हैं। शिक्षा पूरी, डिग्री हाथ में, उम्मीदें आसमान छू रही हैं- लेकिन नौकरी नाम की कोई चीज़ हाथ नहीं आती।

तो सवाल यही है- क्या यह देश कॉकरोच प्रधान है या इंसान विरोधी? तर्क की भाषा में जवाब सरल है: युवा पीड़ित, कॉकरोच सुरक्षित। व्यंग्य की भाषा में: जाओ, कॉकरोच की पूजा करो, युवा को मुकदमे में डाल दो। यही है हमारी नीतियाँ।

और जज साहब, अगर आप कहें कि यह लेख ‘आपत्ति जनक’ है, तो याद रखिए- यह सिर्फ व्यंग्य नहीं, बल्कि तंज भरी हकीकत है। युवा मेहनत कर रहे हैं, पर सिस्टम उन्हें फंसा रहा है। कॉकरोच जिंदा हैं, युवा मरते हैं-सिस्टम की यही क्रूर वास्तविकता है।

अंत में, देश के युवा-कॉकरोच नहीं, इंसान हैं। उन्हें अवसर, सम्मान और सुरक्षा चाहिए। जब तक यह नहीं मिलता, यह देश ‘कॉकरोच प्रधान’ ही रहेगा। और अगर युवा अपनी आवाज़ उठाने लगे, तो शायद कॉकरोच को भी थोड़ी धूल चाटनी पड़े। युवा जागो! सिस्टम बदलो! वरना हाँ, कॉकरोच ही इस देश का असली प्रधान बन जाएगा।

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