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डिलिमिटेशन का सच: विकास बनाम जनसंख्या

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Written by
Rishabh Rai

भारत में परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है, लेकिन हाल के राजनीतिक विवादों ने इसे फिर से केंद्र में ला दिया है। सवाल यह है कि क्या जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण लोकतांत्रिक न्याय है, या फिर यह उन राज्यों के साथ असंतुलन पैदा करता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है- खासकर दक्षिण भारत?

परिसीमन का मूल सिद्धांत सरल है: जिस क्षेत्र की आबादी अधिक होगी, उसे संसद और विधानसभाओं में अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। यह सिद्धांत लोकतंत्र की ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ भावना को मजबूत करता है। लेकिन भारत जैसे विविध देश में यह सिद्धांत व्यवहार में कई जटिलताओं को जन्म देता है।

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दक्षिण भारतीय राज्यों-तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश-ने दशकों पहले ही परिवार नियोजन और जनसंख्या स्थिरीकरण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। इसके विपरीत कई उत्तर भारतीय राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक रही है। यदि परिसीमन केवल वर्तमान जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो राजनीतिक शक्ति का झुकाव स्वाभाविक रूप से उन राज्यों की ओर बढ़ जाएगा जिनकी जनसंख्या अधिक है।

यही वह बिंदु है जहां असंतुलन की आशंका पैदा होती है। दक्षिण भारत का तर्क यह है कि उसे ‘सफलता की सजा’ नहीं मिलनी चाहिए। यानी जिसने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया, उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी घटा दी जाए, जबकि उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की शक्ति बढ़ जाए। यह भावना केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संघीय ढांचे (federal structure) से जुड़ी चिंता भी है।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी इस बहस को सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के दृष्टिकोण से उठाया है। उनका तर्क है कि परिसीमन और महिला आरक्षण को जोड़ने से कई सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। वहीं सरकार की ओर से यह कहा जा रहा है कि यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक संतुलन को अधिक वास्तविक बनाती है।

यह भी सच है कि परिसीमन को लंबे समय से स्थगित रखा गया है ताकि राज्यों के बीच असमानता अचानक न बढ़े। यही कारण है कि 1970 के दशक के बाद कई बार इसे स्थगित या सीमित दायरे में रखा गया। लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या के आंकड़े बदलते हैं, यह मुद्दा फिर से अनिवार्य रूप से सामने आता है।

असली चुनौती यह है कि भारत जैसे संघीय लोकतंत्र में दो अलग-अलग सिद्धांत एक साथ चलते हैं-पहला जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व और दूसरा राज्यों के बीच संतुलन। यदि केवल एक सिद्धांत को लागू किया जाए, तो दूसरा असंतुलित हो सकता है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि परिसीमन होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि इसे कैसे किया जाए ताकि न तो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व कमजोर हो और न ही संघीय संतुलन टूटे।

यदि इस मुद्दे पर समय रहते राजनीतिक सहमति नहीं बनी, तो यह भविष्य में उत्तर-दक्षिण विभाजन की भावना को और गहरा कर सकता है। भारत की ताकत उसकी विविधता और संतुलन में है-और परिसीमन का निर्णय उसी संतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा होगा।

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