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अच्छा दीखना या अच्छा बनना – डॉ. ज्ञानानंददास स्वामी

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Written by
Rishabh Rai

अच्छा दीखना या अच्छा बनना

एक नगर में साहित्य सम्मेलन का उद्घाटन था। सभागृह दीपों से आलोकित था, रेशमी वस्त्रों और सुवासित पुष्पों से वातावरण सुसज्जित। मंच संचालक एक युवक था। अति आधुनिक वेश, मुख पर मधुर मुस्कान, वाणी में आकर्षण। लोग उसके बाह्य वेश-केश की ओर सहज ही आकर्षित थे।

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तभी एक वृद्ध सेवक, थके चरणों से, दीप प्रज्वलन हेतु तेल का पात्र लेकर मंच पर चढ़ा। सहसा उसका हाथ काँपा और गिर पड़ा। कुछ तेल भूमि पर छलक गया। युवक ने मुख सिकोड़ लिया, उसके परिधान पर छींटे पड़ने का भय था। वह दो कदम पीछे हट गया और उपेक्षा से दृष्टि फेर ली। उसी क्षण भीड़ में खड़ा एक साधारण वेशधारी व्यक्ति आगे बढ़ा। उसने अपने अंगवस्त्र से भूमि पोंछी, वृद्ध के काँपते हाथ थामे और स्नेह से कहा, “ आप विश्राम कर लो, यह दीप मैं भर दूँगा।”

उस क्षण सबको समझ में आया, जो युवक मंच पर था, वह दिखने में अवश्य उज्ज्वल था; पर सामान्य मानवीय व्यवहार से दूर था। हाँ, मंच का दीप जला। प्रकाश फैला। पर अधिक उजास तो उस साधारण व्यक्ति के आचरण का था।

स्मरण रहें, रूप की प्रभा ने क्षण भर को नेत्रों को मोहा, पर चरित्र की ज्योति ने हृदय को आलोकित किया। अच्छा दिखना उत्सव का अलंकार है, पर अच्छा बनना जीवन का दीप है, जो केवल सजता है, वह भीड़ में खो जाता है; जो भीतर से उज्ज्वल होता है, वही समय की स्मृति में अमर हो जाता है।

परन्तु आज केवल अच्छे दीखने की लालसा पूरे समाज में तीव्र वेग से बढ़ रही है। इसी भावना को इस युग में ‘इम्प्रेस करने’ की निपुणता कहा जाता है। आज कर्मचारी बोस को इम्प्रेस करने के चक्कर में रहता है, तो यजमान मेहमान को इम्प्रेस करने की फ़िराक ने रहता है। कोलेज का युवा वर्ग तो एक दूसरे को इम्प्रेस करने में ही तीन वर्ष बीता देता है।

किन्तु हमें सोचना चाहिए कि किसीको इम्प्रेस करने में हम जितना समय और तीव्रता लगते हैं उतनी ही तीव्रता यदि हम अपने आपको अच्छा बनाने में लगा दें, तो सारा राष्ट्र ही उन्नत हो जाएगा। हाँ, अच्छा बनने के लिए सद्गुण चाहिए। सच्चे गुणों के विकास के किए समय, अनुशासन और परिश्रम अवश्य लगते हैं किन्तु उसका फल कालजयी बन जाता है, जिसका लाभ हर नई पीढ़ी को मिलता रहता है।

वसतुत: आधुनिक युग में तो मनुष्य का बाह्य जीवन आज दर्पणों का उपासक हो गया है। उसे यह भलीभाँति ज्ञात है कि समाज की दृष्टि पहले रूप पर ठहरती है, गुण पर नहीं; इसीलिए वह देह की परिक्रमा करता है, आत्मा की नहीं।

बाह्य सौंदर्य क्षणिक है, सांझ की लालिमा की भाँति, जो क्षण भर में अँधेरे में विलीन हो जाती है, पर मनुष्य उसी क्षणभंगुर लालिमा को जीवन का लक्ष्य मान बैठा है। अच्छा दिखना साधनों की देन है; वस्त्र बदलते ही, मुखौटा उतरते ही उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। किंतु अच्छा बनना साधना की माँग करता है, संयम, करुणा, सत्य और त्याग की अग्नि में तपकर निखरने की साधना। यह मार्ग श्रमसाध्य है, इसलिए मनुष्य उससे कतराता है। उसे प्रशंसा चाहिए, पर आत्मावलोकन नहीं; उसे तालियाँ चाहिए, पर आत्मसंयम नहीं। परिणाम यह होता है कि समाज रूप की चकाचौंध में डूबा रहता है और मूल्य धूमिल होते जाते हैं।

महंत स्वामी महाराज की वाणी में कहें तो—जब तक मनुष्य का अंतरात्मा जाग्रत नहीं होता, तब तक उसके बाह्य अलंकार केवल शून्य की सजावट हैं। मनुष्य यदि भीतर से उज्ज्वल न हो, तो उसका सारा सौंदर्य एक सजाया हुआ आवरण मात्र है। सच्ची प्रभा वहीं है, जहाँ चरित्र का दीप जलता है; वही दीप समय की आँधी में भी बुझता नहीं।

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