
नई दिल्ली। देशभर में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए इस प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक करार दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है और SIR को मनमाना नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि SIR का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को कमजोर करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करना है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग संविधान के तहत स्वतंत्र संस्था है और उसे मतदाता सूची को सही रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार प्राप्त है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर संबंधित सरकारी एजेंसियों को भेजा जाए। साथ ही संबंधित व्यक्तियों को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का अवसर देने के निर्देश भी दिए गए हैं।
कोर्ट ने पांच अहम सवालों पर अपना फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग के पास SIR कराने की शक्ति है और यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम यानी RP Act के खिलाफ नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि दस्तावेजों की मांग को मनमाना नहीं कहा जा सकता। आधार कार्ड समेत 11 दस्तावेजों को मान्य माना गया है।
गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने जून 2025 में बिहार से SIR प्रक्रिया की शुरुआत की थी। इसके बाद पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी समेत कई राज्यों में यह अभियान चलाया गया। अब तक 10 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में SIR पूरा हो चुका है।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार अब तक कुल 7.41 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। इनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़ नाम काटे गए। दिल्ली में 30 जून से SIR प्रक्रिया शुरू होने जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनाव आयोग के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, वहीं विपक्षी दलों ने फैसले के बाद भी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह फैसला राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम माना जा रहा है।








