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अमेरिकी व्यापार अदालत का बड़ा फैसला- ट्रंप के 10% ग्लोबल टैरिफ पर लगा कानूनी ब्रेक, आर्थिक नीतियों को झटका

ट्रंप के 10% ग्लोबल टैरिफ पर लगा कानूनी ब्रेक
ट्रंप के 10% ग्लोबल टैरिफ पर लगा कानूनी ब्रेक
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Written by
Rishabh Rai

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक नीतियों को गुरुवार को एक बड़ा कानूनी झटका लगा है। अमेरिकी व्यापार अदालत (US Trade Court) ने उनके द्वारा लगाए गए 10% वैश्विक टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया है। अदालत के इस फैसले ने न केवल ट्रंप प्रशासन की आर्थिक रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान से जुड़े हालात के बीच, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक समीकरण पहले से ही अस्थिर बने हुए हैं। ऐसे माहौल में अमेरिकी अदालत का यह निर्णय बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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अदालत का क्या फैसला रहा?

अमेरिकी व्यापार अदालत ने 2-1 के बहुमत से यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा 1970 के दशक के व्यापार कानूनों का इस्तेमाल करते हुए लगाए गए व्यापक 10% टैरिफ कानूनी रूप से उचित नहीं हैं।

अदालत ने कहा कि 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का उपयोग इस प्रकार के व्यापक वैश्विक टैक्स लगाने के लिए नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान केवल विशेष परिस्थितियों, जैसे भुगतान संतुलन संकट या डॉलर की तेज गिरावट को नियंत्रित करने के लिए सीमित समय के लिए टैरिफ लगाने की अनुमति देता है।

अदालत के अनुसार, इस कानून का इस्तेमाल जिस तरीके से किया गया, वह उसके मूल उद्देश्य के विपरीत है।


राज्यों और कंपनियों की चुनौती

इस मामले में 24 अमेरिकी राज्यों और कई छोटे व्यवसायों ने अदालत में याचिका दायर की थी। इन राज्यों में अधिकांश का नेतृत्व डेमोक्रेट्स कर रहे थे।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि राष्ट्रपति द्वारा लगाया गया टैरिफ न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों को भी नजरअंदाज करता है, जिसमें पहले के टैरिफ को रद्द किया गया था।

उनका कहना था कि यह कदम व्यापारिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्थिरता दोनों के खिलाफ है, जिससे घरेलू उद्योगों पर अनावश्यक बोझ पड़ा है।


ट्रंप प्रशासन का बचाव

ट्रंप प्रशासन ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि अमेरिका को भारी व्यापार घाटे का सामना करना पड़ रहा है। प्रशासन ने 1.2 ट्रिलियन डॉलर के वार्षिक वस्तु व्यापार घाटे और GDP के 4% के बराबर चालू खाता घाटे का हवाला दिया था।

उनका तर्क था कि यह कदम अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संतुलित करने और घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए जरूरी था।

हालांकि, कई अर्थशास्त्रियों ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका किसी तत्काल “भुगतान संकट” का सामना नहीं कर रहा है, और इस तरह के टैरिफ आर्थिक स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकते हैं।


रिफंड और तत्काल प्रभाव

अदालत ने आदेश दिया है कि जिन आयातकों ने यह टैरिफ चुकाया है, उन्हें 5 दिनों के भीतर रिफंड दिया जाए। हालांकि यह आदेश फिलहाल केवल उन पक्षों पर लागू होगा जिन्होंने इस मामले को अदालत में चुनौती दी थी।

इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि स्टील, एल्युमीनियम और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों पर लगे टैरिफ इस फैसले के दायरे में नहीं आते, और वे फिलहाल जारी रहेंगे।


अपील की संभावना

अमेरिकी न्याय विभाग इस फैसले को “यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स” में चुनौती दे सकता है। पहले भी अपील अदालत ने ट्रंप प्रशासन के टैरिफ नीतियों के खिलाफ निर्णय दिया था, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह कानूनी लड़ाई अभी लंबी चल सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच सकता है, जहां अंतिम निर्णय तय करेगा कि राष्ट्रपति को व्यापारिक टैरिफ लगाने की कितनी शक्तियां प्राप्त हैं।

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