
स्वतंत्र भारद्वाज गिरफ्तार हो गया। दिल्ली पुलिस ने उसे बुलंदशहर से हिरासत में ले लिया। अच्छी बात है कि आखिरकार पुलिस ने कार्रवाई की। लेकिन सवाल यह है कि यह कार्रवाई इतनी देर से क्यों हुई? क्या दिल्ली पुलिस को कार्रवाई करने के लिए किसी आरोपी का वीडियो वायरल होना जरूरी है? क्या किसी पीड़ित की शिकायत तब तक गंभीर नहीं मानी जाती, जब तक उसके समर्थन में राजनीतिक दल सड़क पर न उतर आएं?
सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए
यह मामला सिर्फ स्वतंत्र भारद्वाज नाम के एक युवक की गिरफ्तारी का मामला नहीं है। यह उस राजनीतिक माहौल का सवाल है, जिसमें एक युवा कथित तौर पर कैमरे के सामने किसी व्यक्ति पर हमले की बात करता है, गंभीर चोटों का जिक्र करता है और फिर राजनीतिक लोगों के नाम लेकर यह संकेत देता है कि सत्ता के गलियारों तक उसकी पहुंच है। बाद में वही व्यक्ति सफाई देता है कि उसने आत्मरक्षा में हमला किया था और कुछ नाम उसने मजाक में लिए थे।
अगर ये बातें गलत हैं तो सरकार और पुलिस को इन्हें गलत साबित करना चाहिए। अगर इनमें सच्चाई का कोई हिस्सा है तो उससे भी बड़ा सवाल खड़ा होता है- आखिर इस आत्मविश्वास के पीछे कौन था?
सरकार बताए, आरोपी को दो महीने तक पुलिस क्यों नहीं ढूंढ पाई?
कहा गया कि 23 जून को संजय कुमार के साथ घटना हुई। शिकायत हुई। एफआईआर की बात सामने आई। पीड़ित पक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया और हल्की धाराएं लगाई गईं।
तो सरकार बताए- अगर पुलिस के पास शिकायत थी, तो कार्रवाई कहां थी? अगर आरोपी खुलेआम घूम रहा था तो पुलिस ने उसे पहले गिरफ्तार क्यों नहीं किया? क्या दिल्ली पुलिस को आरोपी के कथित वीडियो का इंतजार था?
3 सितंबर को वीडियो वायरल हुआ। राजनीतिक दबाव बढ़ा। नेता संसद मार्ग थाने पहुंचे। करीब दो घंटे बातचीत हुई। 72 घंटे के भीतर गिरफ्तारी का आश्वासन दिया गया। और अगले ही घंटे में आरोपी हिरासत में है।
तो सवाल बिल्कुल सीधा है- अगर पुलिस एक दिन में आरोपी तक पहुंच सकती थी, तो पहले क्यों नहीं पहुंची?
सरकार को यह जवाब देना ही होगा।
क्योंकि कानून व्यवस्था सोशल मीडिया के ट्रेंड से नहीं चलती। पुलिस को कार्रवाई के लिए वायरल वीडियो, प्रदर्शन और राजनीतिक दबाव की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
क्या पुलिस सरकार के इशारे पर चलती है?
यह सवाल असहज है, लेकिन पूछा जाना चाहिए।
दिल्ली पुलिस देश की राजधानी की पुलिस है। उससे निष्पक्षता की उम्मीद सबसे ज्यादा होती है। लेकिन जब किसी मामले में पीड़ित पक्ष महीनों तक कार्रवाई की शिकायत करे और कार्रवाई तब तेज हो जब राजनीतिक संगठन सड़क पर उतरें, तो सवाल उठेंगे ही।
सरकार यह क्यों नहीं बताती कि शुरुआती जांच में कौन सी धाराएं लगाई गई थीं? जांच अधिकारी कौन था? शिकायत मिलने के बाद क्या कार्रवाई हुई? आरोपी से पूछताछ क्यों नहीं हुई? क्या वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले की समीक्षा की थी? और सबसे बड़ा सवाल- क्या पुलिस पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव था?
अगर नहीं था तो सरकार जांच की पूरी टाइमलाइन सार्वजनिक क्यों नहीं करती?
अगर था, तो जिम्मेदार कौन है?
कानून का राज तभी माना जाएगा जब सत्ता के करीब होने का दावा करने वाला व्यक्ति भी उसी कानून के सामने खड़ा हो, जिसके सामने एक सामान्य नागरिक खड़ा होता है।
जंतर-मंतर पर आंदोलन को दबाने के लिए कौन खड़ा था?
जंतर-मंतर लोकतांत्रिक विरोध का स्थान है। सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना अपराध नहीं है। सरकार की आलोचना करना देशद्रोह नहीं है। सत्ता से सवाल पूछना किसी राजनीतिक दल के खिलाफ साजिश नहीं है। लेकिन यदि किसी आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए बाहरी लोगों या कथित गुंडों का इस्तेमाल हुआ है, तो सरकार को इसकी जांच करानी चाहिए। यह केवल संजय कुमार के साथ हुई घटना का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि क्या अब दिल्ली में किसी आंदोलन को पुलिस की निगरानी में नहीं, बल्कि कथित राजनीतिक समर्थकों और दबंगों के जरिए नियंत्रित किया जाएगा?
अगर ऐसा नहीं हुआ तो सरकार बताए कि 23 जून को वहां वास्तव में क्या हुआ था।
- कौन-कौन लोग मौजूद थे?
- किसने हमला किया?
- हमला क्यों हुआ?
- पुलिस ने तत्काल क्या किया?
- सीस टीवी फुटेज क्या कहती है?
- प्रत्यक्षदर्शियों के बयान क्या हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण- क्या किसी राजनीतिक व्यक्ति या संगठन का नाम जांच में सामने आया?
राष्ट्रवाद के नाम पर कैसी राजनीति तैयार हो रही है?
इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यही है।
राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति कीजिए, धर्म के नाम पर राजनीति कीजिए, चुनाव जीतने के लिए हर लोकतांत्रिक मुद्दे पर बहस कीजिए- यह सब लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन अगर राष्ट्रवाद और धर्म की राजनीति के नाम पर युवाओं के भीतर दूसरे धर्म, दूसरी जाति और राजनीतिक विरोधियों के प्रति नफरत भरी जा रही है, तो यह सिर्फ राजनीतिक रणनीति नहीं रह जाती। यह सामाजिक खतरा बन जाती है।
सरकार को जवाब देना चाहिए- क्या उसे ऐसी राजनीतिक भाषा स्वीकार है?
क्या सत्ता के समर्थक होने का मतलब कानून से ऊपर होना है?
क्या सरकार के विरोध में खड़े नागरिक को देशद्रोही, दुश्मन या किसी हिंसक कार्रवाई का पात्र मान लिया जाएगा?
अगर नहीं, तो सरकार को ऐसे मामलों में स्पष्ट संदेश देना चाहिए।
क्योंकि युवा भारत को नफरत नहीं, रोजगार चाहिए। उसे हिंसा नहीं, शिक्षा चाहिए। उसे राजनीतिक दुश्मनी नहीं, संवैधानिक अधिकार चाहिए।
नाम लेने से सवाल खत्म नहीं होते
वायरल वीडियो में भाजपा नेता कपिल मिश्रा और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का नाम लिए जाने के बाद राजनीतिक विवाद और बढ़ गया। बाद में भारद्वाज ने सफाई दी कि उसने कुछ बातें मजाक में कही थीं। यह जांच का विषय है कि उसके दावों में कितनी सच्चाई है।
लेकिन सरकार के लिए सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति को राजनीतिक नेताओं के नाम लेने से पहले कोई डर नहीं था? यदि उसके दावे झूठे हैं तो सरकार और संबंधित नेता स्पष्ट रूप से कहें कि उनका उससे कोई संबंध नहीं था और पुलिस जांच में यह बात सामने आए। और यदि कोई संबंध था, तो वह भी सामने आना चाहिए।
लोकतंत्र में पारदर्शिता का अर्थ यही है कि सत्ता के करीब खड़े व्यक्ति से भी वही सवाल पूछे जाएं जो किसी आम आदमी से पूछे जाते हैं।
अब असली परीक्षा पुलिस की है गिरफ्तारी हो गई है। लेकिन गिरफ्तारी अंत नहीं, जांच की शुरुआत है।
अब सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच निष्पक्ष हो। संजय कुमार का मेडिकल दोबारा हो। मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर उचित धाराएं लगें। वायरल वीडियो की फॉरेंसिक जांच हो। वीडियो में किए गए दावों की स्वतंत्र जांच हो। 23 जून की घटना के सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए जाएं।
और अगर किसी राजनीतिक संरक्षण, दबाव या हस्तक्षेप की बात सामने आती है तो उसे भी जांच के दायरे में लाया जाए। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि स्वतंत्र भारद्वाज ने क्या किया? सवाल यह भी है कि उसे ऐसा करने का आत्मविश्वास कहां से मिला? सवाल यह है कि पुलिस ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? सवाल यह है कि जंतर-मंतर पर आंदोलन कर रहे लोगों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?
और सबसे बड़ा सवाल- क्या इस देश में सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने वालों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है या उन्हें कथित राजनीतिक गुंडों से अपनी रक्षा खुद करनी होगी?
सरकार को इन सवालों के जवाब देने चाहिए।
क्योंकि एक युवक की गिरफ्तारी से मामला खत्म नहीं होगा। गिरफ्तारी तो कानून की सामान्य प्रक्रिया है। असली सवाल उस राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का है, जिसमें कार्रवाई तभी तेज होती दिखाई दे जब मामला वायरल हो जाए और सड़कों पर विरोध शुरू हो जाए।
सरकार बताए- कानून सबके लिए बराबर है या सत्ता के करीब होने वालों के लिए कानून की गति अलग है?







