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एल नीनो और ग्लोबल वार्मिंग: क्यों तप रही है पूरी दुनिया ?

क्यों तप रही है पूरी दुनिया ?
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Written by
Rishabh Rai

यूरोप इन दिनों जिस भीषण गर्मी से जूझ रहा है, वह सिर्फ एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सामने खड़े जलवायु संकट का जीवंत उदाहरण है। फ्रांस, स्पेन, ब्रिटेन, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में जून महीने में ही तापमान के दशकों पुराने रिकॉर्ड टूट गए हैं। फ्रांस के पश्चिमी हिस्सों में तापमान 39 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि स्पेन के कई इलाकों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया। ब्रिटेन ने अपने इतिहास का सबसे गर्म जून दिवस दर्ज किया। सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह सब उस समय हुआ, जब यूरोप में सामान्यतः सबसे अधिक गर्मी जुलाई के मध्य से अंत तक पड़ती है। यानी मौसम का पूरा चक्र बदलता दिखाई दे रहा है।

फ्रांस में 1947 से रिकॉर्ड शुरू होने के बाद पहली बार लगातार दो दिन राष्ट्रीय औसत तापमान 29.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ। केवल एक दिन में 147 शहरों ने जून का अब तक का सबसे अधिक तापमान दर्ज किया और 41 मौसम केंद्रों पर तापमान 43 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। रातें भी राहत नहीं दे सकीं। पूरे देश का औसत रात्रि तापमान 21.6 डिग्री सेल्सियस रहा, जो फ्रांस के इतिहास की सबसे गर्म रातों में दर्ज हुआ। स्पेन में लगातार तीन रात तक तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं उतरा। वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसी गर्म रातें दिन की गर्मी से अधिक खतरनाक होती हैं, क्योंकि शरीर को सामान्य तापमान पर लौटने का अवसर ही नहीं मिलता।

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सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि तापमान कितना बढ़ा, बल्कि यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? वैज्ञानिकों के पास इसका स्पष्ट उत्तर है- मानव-जनित जलवायु परिवर्तन। विश्व मौसम विज्ञान और एट्रिब्यूशन अध्ययनों के अनुसार, यदि औद्योगिक युग के बाद ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं बढ़ा होता, तो ऐसी भीषण गर्मी लगभग 50 वर्षों में केवल एक बार आती। लेकिन आज, जब पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.3 से 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, ऐसी हीटवेव हर पाँच वर्ष में एक बार देखने को मिल रही है। कुछ अध्ययनों के अनुसार 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान वाली घटनाएं 50 वर्ष पहले की तुलना में 100 गुना अधिक संभावित हो चुकी हैं।

इतिहास भी इस बदलाव की पुष्टि करता है। 1950 से 1999 के बीच यूरोप में केवल पाँच प्रमुख हीटवेव दर्ज की गई थीं। लेकिन वर्ष 2000 से 2021 के बीच ऐसी घटनाओं की संख्या 18 तक पहुंच गई। यदि 2022, 2023 और 2025-26 की घटनाओं को जोड़ दिया जाए, तो केवल 25 वर्षों में ऐसी चरम गर्मी के 20 से अधिक दौर देखे जा चुके हैं। यह संयोग नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का स्पष्ट पैटर्न है।

इस गर्मी का असर केवल तापमान तक सीमित नहीं है। फ्रांस में कई लोगों की जान जा चुकी है। दर्जनों लोग गर्मी से राहत पाने के लिए नदियों और झीलों में उतरे और डूबने से उनकी मौत हो गई। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मरीज बढ़ रहे हैं। बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इतना ही नहीं, कुछ नदियों का पानी इतना गर्म हो गया कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को शीतलन के लिए पर्याप्त ठंडा पानी नहीं मिल पाया, जिसके कारण बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ।

दुनिया के सामने चुनौती केवल उत्सर्जन कम करने की नहीं है, बल्कि बदलती जलवायु के अनुरूप खुद को ढालने की भी है। शहरों को अधिक हरित बनाना होगा, हीट एक्शन प्लान प्रभावी करने होंगे, जल संरक्षण बढ़ाना होगा और लोगों को समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियों को मजबूत करना होगा। यूरोप की यह गर्मी केवल यूरोप की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाले वर्षों में ऐसी हीटवेव अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य घटना बन जाएंगी।

एल नीनो, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी- क्या दुनिया कार्रवाई के लिए तैयार है?

जलवायु परिवर्तन पर वर्षों से बहस चल रही है, लेकिन अब बहस का समय पीछे छूट चुका है। आज दुनिया उस दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हर महाद्वीप, हर देश और हर समाज महसूस कर रहा है। यूरोप की मौजूदा भीषण गर्मी इसी बदलती दुनिया की सबसे स्पष्ट तस्वीर है।

यूरोप में इस बार गर्मी केवल अधिक नहीं पड़ी, बल्कि सामान्य समय से कई सप्ताह पहले शुरू हो गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्ष 1950 के बाद यह दूसरी बार है, जब इतनी गंभीर हीटवेव जून महीने में ही देखने को मिली। यह संकेत है कि मौसम का पारंपरिक कैलेंडर बदल रहा है।

इस संकट को और गंभीर बना रहा है प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा एल नीनो। विश्व मौसम विज्ञान संगठन और ऑस्ट्रेलिया के मौसम विभाग के अनुसार एल नीनो की स्थिति बनने से वैश्विक तापमान और बढ़ सकता है। इतिहास बताता है कि जब एल नीनो और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव एक साथ सक्रिय होता है, तब दुनिया रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सामना करती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक 2026 और 2027 को अत्यधिक गर्म वर्षों के रूप में देख रहे हैं। यूरोप में हाल की घटनाओं ने इस आशंका को मजबूत किया है। समुद्र की सतह का वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। पश्चिमी भूमध्यसागर में समुद्री हीटवेव सामान्य से लगभग 3 से 4 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज की गई। यह केवल समुद्री जीवों के लिए खतरा नहीं है, बल्कि वैश्विक जलवायु प्रणाली को भी प्रभावित करता है।

ऊर्जा क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहा। फ्रांस में नदियों का पानी इतना गर्म हो गया कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को अपने उत्पादन में कटौती करनी पड़ी। बिजली की मांग बढ़ने से ऊर्जा बाजार पर दबाव बना। कृषि क्षेत्र में मिट्टी की नमी तेजी से कम हुई और फसल उत्पादन पर खतरा बढ़ गया। पर्यटन उद्योग भी प्रभावित हुआ, क्योंकि कई शहरों में लोग दिन के समय घरों से निकलने से बचने लगे।
मानव स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव और भी चिंताजनक है। वर्ष 2022 में यूरोप में गर्मी से 60 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2023 में यह संख्या 47 हजार से अधिक रही। ये आंकड़े बताते हैं कि हीटवेव अब केवल मौसम की खबर नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का सबसे बड़ा संकट बन चुकी है।

इस बीच भारत, पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया भी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सामना कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन किसी एक महाद्वीप की समस्या नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की साझा चुनौती है। ऐसे समय में केवल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन या घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। कार्बन उत्सर्जन में वास्तविक कटौती, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना, जल प्रबंधन को मजबूत करना और प्रभावी हीट एक्शन प्लान लागू करना समय की मांग है। विकसित देशों को भी यह स्वीकार करना होगा कि जलवायु परिवर्तन की कीमत केवल विकासशील देश ही नहीं, बल्कि वे स्वयं भी चुका रहे हैं।

डेटा आधारित संपादकीय

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