
नई दिल्ली/वॉशिंगटन। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में कहा कि भारत लंबे समय तक अमेरिका पर ऊंचे टैरिफ लगाकर फायदा उठाता रहा, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और अमेरिका भी भारत के साथ व्यापार से अच्छी कमाई कर रहा है। ट्रम्प ने यह भी संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच जल्द ही एक बड़ा व्यापार समझौता हो सकता है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच समझ और सहयोग का माहौल बेहतर है।
ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल हाल ही में नई दिल्ली में भारतीय अधिकारियों के साथ कई दौर की वार्ता कर चुका है। दोनों देश एक अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश में जुटे हैं, जिससे लंबे समय से लंबित व्यापारिक मुद्दों का समाधान निकाला जा सके। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार बातचीत सकारात्मक रही है और दोनों पक्ष ऐसे समझौते की दिशा में काम कर रहे हैं जिससे दोनों देशों को लाभ मिले।
हालांकि, बातचीत के बीच कुछ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। अमेरिका ने उन देशों पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है जिन पर जबरन मजदूरी से जुड़े मामलों में पर्याप्त कार्रवाई न करने के आरोप हैं। इस प्रस्तावित सूची में भारत का नाम भी शामिल है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो अमेरिका को निर्यात होने वाले भारतीय उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लग सकता है। इससे भारतीय वस्त्र, इंजीनियरिंग उत्पाद, जेम्स एंड ज्वेलरी तथा अन्य निर्यात आधारित उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
भारत सरकार का कहना है कि इस संबंध में अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। अमेरिका पहले विभिन्न पक्षों से सुझाव और आपत्तियां प्राप्त करेगा, जिसके बाद अंतिम फैसला होगा। इसलिए फिलहाल भारतीय निर्यातकों के लिए स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते का खाका फरवरी 2026 में ही तैयार हो गया था। उस समय दोनों देशों ने एक अंतरिम समझौते पर सहमति भी बनाई थी। इसका उद्देश्य उन व्यापारिक विवादों को सुलझाना था जो कई वर्षों से दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को प्रभावित कर रहे थे। लेकिन अमेरिकी न्यायिक प्रक्रियाओं और टैरिफ से जुड़े विवादों के कारण समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका।
ट्रेड डील में सबसे बड़ा मुद्दा टैरिफ और बाजार पहुंच का है। भारत चाहता है कि अमेरिका भारतीय वस्त्र उद्योग, दवा उद्योग, कृषि उत्पादों और इंजीनियरिंग सामानों पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क को कम करे। दूसरी ओर अमेरिका चाहता है कि भारत अपने बाजार को अमेरिकी कृषि उत्पादों, डेयरी वस्तुओं, शराब, मेडिकल उपकरणों और डिजिटल सेवा कंपनियों के लिए अधिक खोल दे।
विशेषज्ञों के अनुसार कृषि क्षेत्र इस समझौते की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। अमेरिका अपने मक्का, सोयाबीन, बादाम, सेब और अन्य कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में अधिक पहुंच दिलाना चाहता है। लेकिन भारत के सामने करोड़ों किसानों की आजीविका का सवाल है। भारतीय नीति निर्माताओं का मानना है कि कृषि क्षेत्र में अत्यधिक उदारीकरण से घरेलू किसानों को नुकसान हो सकता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
डेयरी क्षेत्र भी कम विवादास्पद नहीं है। अमेरिका चाहता है कि उसके डेयरी उत्पादों को भारत में व्यापक बाजार मिले। लेकिन भारत धार्मिक, सांस्कृतिक और खाद्य मानकों के आधार पर कुछ अमेरिकी डेयरी उत्पादों को लेकर आपत्ति जताता रहा है। यही कारण है कि डेयरी सेक्टर में सहमति बनाना दोनों देशों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
इसके बावजूद दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक और आर्थिक संबंध इस बात के संकेत देते हैं कि व्यापार समझौते की संभावनाएं अभी भी मजबूत हैं। अमेरिका भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है, जबकि भारत अमेरिकी कंपनियों के लिए तेजी से उभरता हुआ बड़ा बाजार है। ऐसे में दोनों देशों की कोशिश होगी कि मतभेदों को कम करते हुए किसी संतुलित और पारस्परिक लाभ वाले समझौते तक पहुंचा जाए।
आने वाले महीनों में होने वाली वार्ताएं तय करेंगी कि भारत और अमेरिका अपने आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाकर इस बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील को अंतिम रूप दे पाते हैं या नहीं। फिलहाल उम्मीद और चुनौतियां दोनों साथ-साथ चल रही हैं।







