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‘मैं केवल इतना जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता’- अहंकार के इस दौर में सबसे खतरनाक सच्चाई

सुकरात की कहानी
सुकरात की कहानी
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Written by
Rishabh Rai

‘मैं केवल इतना जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता’- सुकरात का यह वाक्य जितना सरल है, उतना ही असहज करने वाला भी। क्योंकि यह सीधे हमारे अहंकार पर चोट करता है। और सच कहें तो आज का दौर अहंकार का ही दौर है-ज्ञान का नहीं।

आज हर आदमी जानता है। हर विषय पर जानता है। राजनीति, अर्थव्यवस्था, धर्म, विज्ञान-सब पर उसकी ‘पक्की राय’ है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह ज्ञान नहीं, ‘जानने का भ्रम’ है। और यही भ्रम आज समाज की सबसे बड़ी बीमारी बन चुका है।

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सोशल मीडिया ने इस भ्रम को ऑक्सीजन दे दी है। यहां हर व्यक्ति अपने-अपने ‘सत्य’ के साथ खड़ा है। कोई सवाल नहीं, कोई संदेह नहीं-बस ठोक कर बोल देना है। अगर आप असहमत हैं तो आप ‘गलत’ हैं, ‘अज्ञानी’ हैं, या फिर ‘दुश्मन’ हैं। संवाद की जगह निर्णय ने ले ली है, और जिज्ञासा की जगह जिद ने।

यही वह जगह है जहां सुकरात हमें आईना दिखाते हैं। वे कहते हैं-तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या यह नहीं कि तुम नहीं जानते, बल्कि यह है कि तुम यह मानने को तैयार नहीं हो कि तुम नहीं जानते।

आज राजनीति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। समर्थक हों या विरोधी- दोनों पक्ष खुद को पूरी तरह सही मानते हैं। तथ्य पीछे छूट जाते हैं, भावनाएं आगे आ जाती हैं। कोई यह पूछने को तैयार नहीं कि ‘क्या मैं गलत हो सकता हूँ?’ क्योंकि यह सवाल पूछना अपने ही बनाए किले को तोड़ने जैसा है।

मीडिया भी इस खेल का हिस्सा बन चुका है। खबरें अब जानकारी देने के लिए नहीं, बल्कि ‘पोजीशन’ लेने के लिए बनाई जाती हैं। बहसें सच्चाई खोजने के लिए नहीं, बल्कि शोर पैदा करने के लिए होती हैं। एंकर सवाल नहीं पूछते- फैसला सुनाते हैं। और दर्शक सोचते नहीं- सिर्फ पक्ष चुनते हैं।

इस पूरे माहौल में सबसे ज्यादा नुकसान किसका हुआ है? सच का। सच अब जटिल है, इसलिए अलोकप्रिय है। झूठ आसान है, इसलिए वायरल है।

सुकरात का विचार इसीलिए खतरनाक है- क्योंकि यह हमें रोकता है। यह कहता है: ‘रुको, जो तुम मान रहे हो, क्या वह सच में सच है?’ और आज के समय में ‘रुकना’ ही सबसे मुश्किल काम है।

हम तेजी से प्रतिक्रिया देने वाले समाज में बदल चुके हैं। कोई घटना हुई नहीं कि राय तैयार। कोई वीडियो आया नहीं कि फैसला सुना दिया। हमें न पूरी जानकारी चाहिए, न समझ- बस तुरंत निष्कर्ष चाहिए। यह मानसिकता हमें भीड़ में बदल देती है, व्यक्ति नहीं रहने देती।

शिक्षा भी इस संकट से अछूती नहीं है। डिग्रियां बढ़ रही हैं, लेकिन सवाल पूछने की क्षमता घट रही है। बच्चे उत्तर याद कर रहे हैं, लेकिन प्रश्न करना भूल रहे हैं। और जब समाज प्रश्न करना छोड़ देता है, तब वह आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम ‘जानने’ के इतने करीब पहले कभी नहीं थे- और ‘समझने’ से इतने दूर भी नहीं।
तो क्या समाधान है?

समाधान उतना ही असहज है जितना सुकरात का वाक्य- स्वीकार करना कि हम सब कुछ नहीं जानते। इसका मतलब यह नहीं कि हम अज्ञानी बने रहें, बल्कि इसका मतलब है कि हम सीखने के लिए खुले रहें। मतलब यह कि हम बहस जीतने से ज्यादा सच जानने में रुचि रखें। मतलब यह कि हम अपनी ही राय पर शक कर सकें।
क्योंकि सच यही है- ज्ञान की शुरुआत ‘न जानने’ से होती है, ‘सब जान लेने’ से नहीं।

आज जरूरत ‘एक और राय’की नहीं है, बल्कि ‘एक ईमानदार सवाल’ की है। जरूरत इस बात की नहीं कि हम कितनी जोर से बोलते हैं, बल्कि इस बात की है कि हम कितना सुन सकते हैं।

सुकरात को उनके समय में जहर का प्याला दिया गया था, क्योंकि उन्होंने लोगों के भ्रम को तोड़ा था। आज भी जो कोई यह कहेगा कि ‘शायद मैं गलत हूँ’, वह भीड़ में अकेला पड़ जाएगा। लेकिन शायद वही अकेलापन असली आजादी है- सोचने की आजादी। और शायद यही वह शुरुआत है, जहाँ से एक बेहतर समाज बन सकता है।

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