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किताबों से आहत सरकारें! मोदीकाल से 4 गुना ज्यादा किताबें नेहरू युग में हुई बैन, इन्दिराकाल में 7 पर रोक, कांग्रेस सरकारों ने 30 किताबों को रोका तो भाजपा ने 5 पर लगाया बैन

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किताबों से आहत सरकारें! मोदीकाल से 4 गुना ज्यादा किताबें नेहरू युग में हुई बैन, इन्दिराकाल में 7 पर रोक, कांग्रेस सरकारों ने 30 किताबों को रोका तो भाजपा ने 5 पर लगाया बैन

किताबें आपकी सच्ची दोस्त और गाइड होती हैं मगर जरूरी नहीं कि वो जो रास्ता आपको दिखाना चाहती हों, आपकी सरकार उससे सहमत हो

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दुनिया भर में अलग-अलग देशों में आज तक हजारों किताबें बैन हो चुकी हैं. किसी किताब को ज्यादा अश्लील माना गया, तो किसी किताब को उस देश की धार्मिक भावनाओं या सद्भाव के लिए खतरा माना गया. भारत में आजादी के बाद से आज तक करीब 45 किताबें राष्ट्रीय स्तर पर बैन हो चुकी हैं. इस तरह के बैन को किसी भी सरकार के कम या ज्यादा लिबरल होने से भी जोड़ा जाता रहा है. मगर भारत में बैन हुई किताबों की लिस्ट की पड़ताल कुछ रोचक फैक्ट्स बताती है।  अभिव्यक्ति की आजादी पर सख्ती के लिए बदनाम हुई मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 से अब तक 4 किताबों पर बैन लगाया गया है।

मगर लिबरल माने जाने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के सत्ता में रहते हुए कुल 16 किताबों पर बैन लगाया गया था यानी मोदी सरकार से 4 गुना ज्यादा किताबें नेहरू सरकार के समय में बैन हुई थीं. राष्ट्रीय स्तर पर बैन हुई किताबों का ये आंकड़ा कस्टम्स डिपार्टमेंट की उस सूची पर आधारित है, जिसमें उन सभी किताबों का जिक्र है जिन्हें भारत में लाया जाना प्रतिबंधित है. सरकार का कोई विभाग बैन हुई किताबों का रिकॉर्ड एकत्रित नहीं करता. हालांकि, जब भी कोई किताब बैन की जाती है तो उसकी अधिसूचना जरूर जारी होती है. किताबों पर प्रतिबंध के स्तर और तरीके भी अलग-अलग हैं।

पंडित जवाहर लाल नेहरू आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री थे. उस दौर में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ दुष्प्रचार के लिए हर तरीका अपनाया था. नेहरू 17 साल पीएम रहे इस दौरान 16 किताबें बैन हुई. कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने पक्ष में करने के लिए उसने किताबों का भी सहारा लिया. बैन की गई किताबों में से 8 ऐसी थीं जिनमें भारत के बारे में भ्रामक प्रचार किया गया था. 16 प्रतिबंधित किताबों में से 3 ही ऐसी थीं जिन्हें धार्मिक भावनाएं आहत होने की वजह से बैन किया गया।

बैन किताबों के नाम
पाकिस्तान में प्रकाशित पाकिस्तान पसमन्जरवा पेशमंजर, सीजफायर, खाक और खून, चन्द्रमोहिनी, मर्का-ए-सोमनाथ (सोमनाथ पर भ्रामक प्रचार के कारण), भूपत सिंह (कारण स्पष्ट नही), व्हाट हैज रिलीजन (धार्मिक भावनाएं आहत के कारण), राम रिटोल्ड (रामायण पर भ्रामक प्रचार के कारण), डार्क अर्ज (कारण स्पष्ट नही), कैप्टिव कश्मीर (कश्मीर पर भ्रामक प्रचार के कारण), द हार्ट ऑफ इंडिया (भारतीय ब्यूरोक्रेसी पर व्यंग्य के कारण), द लोटस एंड द रोबोट (भारत पर भ्रामक प्रचार के कारण), नाइन आवर्स टू राम (गांधी जी की हत्या को सही बताने के कारण), नेपाल (कारण स्पष्ट नही), आयशा (इस्लाम पर आपत्तिजनक बातें होने के कारण), अनआर्म्ड विक्ट्री (भारत-चीन युद्ध पर आधारित)

2014 से 2022 के बीच मोदी सरकार के कार्यकाल में 4 किताबों पर प्रतिबंध लगा. हालांकि, इनमें से किसी भी किताब पर बैन का कारण राजनीतिक नहीं है. दो किताबें ‘संत सूर्य तुकाराम’ और ‘लोकसखा द्यानेश्वर’ एक ही लेखक आनंद यादव की हैं. इन दोनों को धार्मिक भावनाएं आहत करने की वजह से बैन किया गया. दो किताबों ‘सहारा’ और ‘गॉडमैन टु टाइकून’ के खिलाफ मानहानि के मुकदमे के बाद बैन का आदेश कोर्ट की ओर से दिया गया. ‘सहारा’ पर बैन अस्थायी था।

1964 से 1997 के बीच 7 प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में कुल 17 किताबें बैन हुईं. इनमें से सबसे ज्यादा 7 किताबों पर इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रतिबंध लगा था. सलमान रुश्दी की चर्चित किताब ‘सेटैनिक वर्सेज’ पर 1988 में बैन लगा था, तब राजीव गांधी पीएम थे. इस दौर में कम से कम 5 किताबों पर प्रतिबंध इसलिए लगा था क्योंकि उनमें भारत सरकार की नीतियों को गलत तरीके से दिखाया गया था. दो किताबों पर प्रतिबंध आंशिक था. इनमें से एक ‘प्राइस ऑफ पावर’ में कहा गया था कि पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के एजेंट थे. मोरारजी ने कोर्ट से इस किताब की बिक्री पर स्टे लिया था, जिस दौरान उन्होंने अमेरिकी कोर्ट में प्रकाशक के खिलाफ मुकदमा दायर किया था. ‘स्मैश एंड ग्रैब: एनेक्सेशन ऑफ सिक्किम’ किताब के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका के बाद प्रतिबंध लगा था. हालांकि बाद में यह हट गया था।

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