
होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक राजनीति का केंद्र बन गया है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। ईरान के संसद अध्यक्ष का हालिया बयान इस टकराव की गंभीरता को दर्शाता है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर ईरानी जहाजों को होर्मुज से गुजरने से रोका गया तो अन्य देशों के जहाजों को भी नहीं गुजरने दिया जाएगा।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में इसका बंद होना अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतों को अस्थिर कर सकता है। इसी खतरे को देखते हुए अमेरिका ने अपने आपातकालीन भंडार से 2.6 करोड़ बैरल तेल जारी किया है, ताकि सप्लाई में कमी को संतुलित किया जा सके।
हालांकि, हालात केवल आर्थिक नहीं बल्कि सैन्य दृष्टि से भी चिंताजनक हैं। ईरान द्वारा भारतीय जहाजों पर फायरिंग और कई जहाजों को रोकना इस बात का संकेत है कि स्थिति कभी भी बड़े टकराव में बदल सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि उनकी ऊर्जा जरूरतें इस मार्ग पर निर्भर हैं।
दूसरी ओर, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखने की बात कही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका फिलहाल पीछे हटने के मूड में नहीं है। हालांकि बातचीत की संभावना जताई जा रही है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच विश्वास की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।
संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर ग़ालिबफ़ ने स्पष्ट किया कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन इसे उसकी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। यह बयान ईरान की दोहरी रणनीति को दर्शाता है- एक तरफ संवाद की इच्छा और दूसरी तरफ अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए कठोर रुख है। दूसरी ओर, राष्ट्रपति ट्रंप का यह कहना कि नाकेबंदी तब तक जारी रहेगी जब तक कोई समझौता नहीं हो जाता, अमेरिका की रणनीति को स्पष्ट करता है। अमेरिका आर्थिक और सैन्य दबाव के जरिए ईरान को झुकाने की कोशिश कर रहा है।
कुल मिलाकर, यह संकट केवल दो देशों के बीच टकराव नहीं बल्कि वैश्विक स्थिरता की परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों की सफलता ही तय करेगी कि यह तनाव युद्ध में बदलेगा या शांति की ओर बढ़ेगा।






