
राजधानी दिल्ली एक बार फिर जहरीली हवा की गिरफ्त में है। हालिया शोध रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि बीते एक वर्ष में प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण दिल्ली में करीब 17 हजार लोगों की मौत हुई है। यह आंकड़ा हाई ब्लड प्रेशर और मधुमेह जैसी बीमारियों से होने वाली वार्षिक मौतों से भी अधिक है।
अध्ययन के अनुसार दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 और पीएम 10 कणों की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों से करीब 8 गुना अधिक दर्ज की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक इस जहरीली हवा में रहने से श्वसन, हृदय और मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। स्मॉग के चलते बच्चों और बुजुर्गों में सांस की तकलीफ के मामले बढ़े हैं। राजधानी के कई अस्पतालों में ओपीडी में मरीजों की संख्या बीते हफ्ते के मुकाबले 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गई है। डॉक्टरों के मुताबिक, प्रदूषण का असर सिर्फ फेफड़ों पर नहीं, बल्कि शरीर के लगभग हर अंग पर पड़ रहा है।
दिल्ली सरकार ने स्कूलों में छुट्टियां बढ़ाने और निर्माण कार्यों पर रोक जैसे कदम उठाए हैं। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि लोग जरूरत के बिना बाहर न निकलें, एन-95 मास्क का उपयोग करें और इनडोर प्लांट्स लगाएं। प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा संकट बन चुका है — एक ऐसा “साइलेंट किलर” जो हर सांस के साथ मौत का ज़हर घोल रहा है।









