
यूक्रेन और रूस के बीच जारी जंग को तीन साल से ज़्यादा हो चुके हैं, लेकिन फिलहाल दोनों देशों के बीच कोई सीज़फायर लागू नहीं है। हाल ही में अमेरिका के अलास्का में हुई शिखर वार्ता और उससे जुड़े राजनयिक प्रयासों के बावजूद युद्धविराम की कोई ठोस दिशा नहीं बन पाई है।
अलास्का शिखर वार्ता: उम्मीदें और हकीकत
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की के बीच अगस्त 2025 में हुई त्रिपक्षीय वार्ता से पहले कई उम्मीदें जताई जा रही थीं। लेकिन इस वार्ता से न तो कोई लिखित समझौता निकला और न ही कोई अंतरिम सीज़फायर लागू हुआ। राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने इस दौरान दुनिया से अपील की कि “अब समय आ गया है कि हत्या और विनाश को रोका जाए,” लेकिन रूस ने ज़मीनी हमलों को रोकने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। इसे हम रूस का अड़ियल रुख भी कह सकतें है… ऐसा इसलिए क्योकि… रूस की ओर से जारी बयान में यह स्पष्ट कर दिया गया कि वे वर्तमान परिस्थितियों में सीज़फायर को स्वीकार नहीं करेंगे। इसके पीछे रूस की रणनीतिक बढ़त बनाए रखने की मंशा मानी जा रही है। वहीं, यूक्रेन ने अमेरिका और यूरोपीय सहयोगियों की उपस्थिति में यह प्रस्ताव भी रखा कि एक 30-दिन का अंतरिम युद्धविराम लागू किया जाए, मगर रूस ने उस पर भी कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया।
सीमित प्रयास: कैदियों का आदान-प्रदान
जहाँ एक ओर सैन्य मोर्चे पर कोई विराम नहीं दिखता, वहीं तुर्की की मध्यस्थता में इस्तांबुल में हुई बातचीत के दौरान रूस और यूक्रेन के बीच कैदियों के आदान-प्रदान पर सहमति बनी। लगभग 1,000 बंदियों की अदला-बदली को एक मानवतावादी कदम माना जा रहा है, परंतु यह सीज़फायर की दिशा में निर्णायक कदम नहीं बन सका।
क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय समुदाय?
संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में एक बयान में कहा कि, “सीज़फायर संभव है, लेकिन यह निकट भविष्य की बात नहीं लगती।” यूरोपीय संघ, नाटो और संयुक्त राष्ट्र ने भी युद्ध को समाप्त करने की अपील की है, लेकिन कोई पक्ष फिलहाल पीछे हटने को तैयार नहीं है। इस संघर्ष में अब तक लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं, हजारों की जान जा चुकी है और यूक्रेन की बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। रूस भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और आर्थिक दबावों से जूझ रहा है, लेकिन युद्धविराम के लिए उसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति फिलहाल नदारद है।









